aadiwasiजब से सरकार ने जंगल में रहनेवालों को बेदखल करना शुरू किया है, तब से जंगल पर आश्रित सहरिया समुदाय के समक्ष जान बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है. विकास के नाम पर हो रहे विस्थापन ने इनकी जिन्दगी को दूभर बना डाला है, वहीं भाषा, संस्कृति परंपराओं और रीति रिवाजों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गए हैं.

सहरिया का अर्थ है शेर के साथ रहने वाला. सहरिया जनजाति का विस्तार क्षेत्र अन्य जनजातियों के छोटे क्षेत्रों की तुलना में भिन्न प्रकार का है. यह जनजाति मध्यप्रदेश के उत्तर पश्चिमी जिलों में फैली हुई है. यह जनजाति आधुनिक ग्वालियर एवं चंबल संभाग के जिलों में प्रमुखता से पाई जाती है. इन संभागों के जिलों में इस जनजाति की जनसंख्या का 84.65 प्रतिशत निवास करता है, शेष भाग भोपाल, सागर, रीवा, इंदौर और उज्जैन संभागों में निवास करता है. अब अधिकांश सहरिया या तो छोटे किसान हैं या मजदूर. इनका रहन-सहन और धार्मिक मान्यताएं क्षेत्र के अन्य हिंदू समाज जैसी ही हैं किंतु गोदना गुदाने की परंपरा अभी भी प्रचलित है. सहरिया जनजाति होने के कारण मोटे अन्न पर निर्भर हैं.

मध्य प्रदेश में श्योपुर के जंगल में इनकी खासी तादाद थी. ये शिवपुरी और श्योपुर जिले के बीच 344 वर्ग किलोमीटर में फैला है. 900 वर्ग किलोमीटर के ब़फर ज़ोन को मिला दें तो पूरा इलाका 1244 वर्ग किलोमीटर का है. जंगल के भीतर  सहरिया जनजाति के गांव हैं.

श्योपुर से एशियाटिक शेर 1873 में खत्म हो गए, लेकिन सहरिया का जंगलों पर आश्रय खत्म नहीं हुआ. 1996 में कूनो पालपुर अभयारण्य में एशियाटिक शेरों को फिर से बसाने की योजना बनी. तब यहां के सहरिया लोगों को जंगल से जाना पड़ा. अभयारण्य की खातिर एक-एक कर 24 गांवों के 1543 परिवारों को विस्थापित कर दिया गया. विस्थापितों में 80 फीसद लोग सहरिया जनजाति के थे. मुआवजे के रूप में हर परिवार को 36000 रुपये नकद दिए गए. साथ में दो हेक्टेयर जमीन और मकान बनाने के लिए 502 वर्गमीटर ज़मीन दी गई. हालांकि, 1894 में बने भूमि अधिग्रहण अधिनियम का जोर नुकसान की बजाय नकद मुआवज़े पर था, लेकिन केन्द्र सरकार ने विस्थापितों के हितों की रक्षा के लिए नई राष्ट्रीय नीति रिसेटेलमेंट एवं रिहैबिलिटेशन की घोषणा 2007 में की.

इसके तहत जिन परियोजनाओं के तहत मैदानी इलाकों में 400 और पहाड़ी इलाकों में 200 परिवार प्रभावित होते हों, वहां विस्थापन के सामाजिक प्रभाव का आकलन किया जाना जरूरी है. इसी अधिनियम में लिखा है कि भूमि का अधिग्रहण बाजार दर पर होगा. आंकड़े बताते हैं कि 1950 के बाद से भारत में वन्य जीवों से जुड़ी परियोजनाओं में करीब 6 लाख लोग विस्थापित हुए हैं.

यह बाकी सभी योजनाओं-परियोजनाओं की वजह से हुए विस्थापन का 2.8 फीसद है. इनमें से करीब 21 फीसद यानी 1 लाख 25 हजार लोगों का पुनर्वास किया गया, यानी 4 लाख 75 हजार लोगों का पुनर्वास नहीं हो पाया. यह विस्थापित लोगों का करीब 79 प्रतिशत है. कुल विस्थापितों में साढ़े 4 लाख लोग जनजाति समुदाय के हैं, यानी करीब 75 फीसद. सिर्फ एक लाख जनजातियों का ही पुनर्वास हो सका, यानी 78 फीसद विस्थापित जनजातियों का पुनर्वास आजतक नहीं हो पाया है.

कूनो पालपुर में यह विस्थापन इस अधिनियम के लागू होने के काफी पहले हो चुका था. सहरिया जनजाति के लोगों को भी विस्थापन के बदले नकद मुआवज़ा मिला, लेकिन इस मुआवजे के बदले सहरिया को अपने सारे पशुधन, जंगलों से इकट्ठा की जाने वाली गोंद, तेंदूपत्तों, सफेद मूसली,कंद, कई तरह की फलियों, सतावर और जंगली भाजी जैसे वनोपजों से महरूम होना पड़ा. वनोपजों से पर्याप्त पोषक आहार मिल जाता था, इसलिए इनके समक्ष न तो कुपोषण का संकट था और न ही खाद्य सुरक्षा के लिए सरकार पर आश्रित रहना पड़ता था. समुदाय,जंगल और जमीन से दूर रहने के कारण परंपरागत खाद्यान्न से वंचित होते गए. अब आजीविका के संकट ने उन्हें भुखमरी की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया.

कुपोषण की बात करें तो सिर्फ श्योपुरी में छह माह के दौरान  जनवरी से मई 2016 के बीच 132 बच्चों की मौत हुई है. शिवपुरी व श्योपुर जिलों में 50 हजार से ज्यादा सहरिया बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं. शिवपुरी व श्योपुर में पिछले साल कुपोषण के कारण 150 से ज्यादा बच्चों की मौत के बाद   राज्य सरकार ने सब्जी, फल और दूध के लिए हर माह एक हजार रुपये देने की योजना पिछले साल से लागू की है.

कूनो-पालपुर अभ्यारण्य में गिर के शेर लाने में नाकाम राज्य सरकार अब वहां बाघ बसाने की तैयारी मे है. दूसरी ओर नेशनल पार्क शिवपुरी के अंदर बल्लारपुर गांव के 100 सहरिया परिवारों को 2000 में पार्क और मणिखेड़ी डेम बनने के कारण विस्थापित किया गया था. तब सरकार ने इन परिवारों को नजदीक में दो-दो हेक्टेयर जमीन देने का वादा किया था. इनमें से 61 परिवारों को जमीन दे दी गई, लेकिन 39 परिवारों को जो जमीन दी जा रही थी, वह जांच में वनभूमि पाई गई. लिहाजा उन्हें भूमि का आवंटन ही नहीं हुआ. इस मामले में राज्य मानव अधिकार आयोग ने सरकार और वन विभाग को फटकार लगाई है. बल्लारपुर गांव के 39 सहरिया आदिवासी परिवार डेढ़ दशक से अपनी ज़मीन, मुआवज़े और पट्टे के लिए दर-दर भटक रहे हैं.

इनके  बस्तियों की हालत अब भी चिंताजनक है. कई इलाके ऐसे हैं जहां पानी, बिजली, रोजगार, आवास जैसी आवश्यक सुविधाएं भी नसीब नहीं हो पाई है. शिवपुरी जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित है खतौरा कस्बा. इस कस्बे में सहरिया आदिवासियों की बस्ती है. ज्ञाना आदिवासी (65) बताते हैं कि उनकी बस्ती में कभी कोई काम नहीं हुआ, पीने को पानी तक मुश्किल से मिल पाता है. नहाने के पानी के लिए उन्हें 15 से 30 दिन तक इंतजार करना होता है.

उन्होंने कहा, सरकार सिर्फ वादे और घोषणाएं करती है. भागवती (55) ज्ञाना कहती हैं कि उनकी बस्ती के करीब छात्रावास है, उसका हैंडपंप ही उनका एकमात्र सहारा है. दिन में एक डिब्बा (16 लीटर) पानी मिल जाता है.  सरकारी योजना के दावे की पोल खोलते हुए कराहल के ग्राम रींछी के सहरिया जनजाति के लोग कहते हैं कि दो माह से कंट्रोल वाला गेहूं नहीं दे रहा है. ऐसी महंगाई में हम बच्चों का पेट कैसे भरेंगे. राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना में एकल बत्ती कनेक्शन सहरिया जनजाति के परिवारों को निःशुल्क बिजली दिए जाने का प्रावधान है.

पीएचई खराब पड़े हैंडपंपों को भी ठीक कराने में रुचि नहीं ले रही है. कलारना सरपंच रामदुलारी बताती हैं कि उनकी पंचायत में 144 महिलाएं हैं जिनमें से कुछ को ही एक हजार रुपए मिल रहा है. सचिन कुमार जैन बताते हैं कि सहरिया आदिवासी तो जमीन जोत ही रहा है. इससे उसके परिवार को पांच से छह महीने का अनाज मिल रहा है. यदि कुपोषण मिटाना है तो सहरिया आदिवासियों को जमीन का वैधानिक मालिक बनाना होगा. एकता परिषद के महिला संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष जिलकार हेरिस बताती हैं कि आदिवासी परिवारों को पूर्व में सरकार की ओर से दिए गए पट्टे की जमीनों पर दबंगों का कब्जा है. इनका तहसीलदारों की ओर से सीमांकन नहीं कराया जा रहा है.

आदिवासी महिलाओं और बच्चों में कुपोषण दूर करने के लिए मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी एक हजार रुपए महीना नहीं दिया जा रहा है. सहरिया समाज की मांगों को पूर्ण नहीं किया गया, तो होली के बाद आदिवासी समाज महिला और बच्चों के साथ तहसील मुख्यालयों पर ही डेरा डालेगा.  सहरिया आदिम जनजाति की जरूरतों के अनुरूप योजना का क्रियान्वयन नहीं हो पाने के कारण शिशु मृत्यु दर और बाल मृत्यु दर तमाम आदिवासी समुदायों में भी सबसे ज्यादा है.

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