हाल में धारा 377, जो अप्राकृतिक सेक्स कोे दंडनीय अपराध मानती है, पर सुप्रीम कोर्ट ने देश के लिए फिर से मुहर लगा दी. एलजीबीटी समुदाय के लोग और उनके दोस्त यह चाहते थे कि इसे बदल दिया जाए. दुष्कर्म पर क़ानून निर्भया मामले के बाद फिर से बनाया गया. यह तभी संभव हो पाया, जब कई सारी बड़ी घटनाएं एक साथ हुईं. इसके लिए भीड़ ने काफी प्रदर्शन किए और ऐसे विशेषज्ञों ने रिपोर्ट बनाई, जो दयाभाव रखते थे और एक अनुपयोगी संसद ने इस पर क़ानून भी बना दिया, लेकिन धारा 377 के लिए ऐसी कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई गई. यही नहीं, सेक्शन 295-ए के भी मामले में यह संभावना नहीं है कि कोई बड़ा जनांदोलन चलाया जाए.
DUN-POLICE-LATHI-CHARGE-IN-जब भारत आज़ाद हुआ, तो इसके प्रथम प्रमुख वही बने, जो ब्रिटिश शासन के आख़िरी वायसरॉय थे. पाकिस्तान ने ऐसा नहीं किया और मुहम्मद अली जिन्ना देश के पहले प्रमुख बने. कांग्रेस ने इतने सालों तक स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ने के बाद भी ब्रिटिश राज के नियमों के साथ ही शासन जारी रखा बजाय इसके कि वह पूर्णत: खुद ही शासन करती. ब्रिटिश शासन के विरोध के लिए जो क़ानूनी गांधीवादी तरीका कांग्रेस ने अपनाया था, उसमें भी यह संदेश अंतर्निहित था. कांग्रेस ने कभी भी ब्रिटिश शासन के समय बनाई गई अदालती व्यवस्था को चुनौती नहीं दी और न ही उस क़ानूनी तंंत्र को, जो अंगे्रजी हुकूमत केे समय बनाया गया था.
यह पुराने तरीके को चलाते रहने का स्वभाव ही था, जिसकी वजह से भारत को स्थायी शासन पाने में आसानी हुई, जबकि यही तरीका इसके पड़ोसी देशों को रास नहीं आया. सिविल सर्विस और लगभग सभी नियम एवं तरीके ब्रिटिश शासन से ही लिए गए हैं. भारतीय सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुराने कठोर नियमों को न स़िर्फ बनाए रखा, बल्कि उन्हें इस्तेमाल भी किया. 1975-77 में इमरजेंसी लगाकर इसकी याद भी दिला दी गई थी कि ये ऐसे नियम हैं, जिनका इस देश की जनता से कुछ लेना-देना नहीं है. भारतीय संविधान की बहुत सारी दबावकारी धाराएं गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 से ही ली गई हैं. इस समय भी भारत में ब्रिटिश शासन ही था.
व्यवस्था बनाए रखने का मुख्य औजार भारतीय दंड संहिता रोजाना तो नहीं, लेकिन अक्सर नागरिकों के बहुत से क्रियाकलाप बाधित करने का काम करती है, जैसे बैठकें, जुलूस या पांच लोगों से ज़्यादा की कोई भी सभा इत्यादि रोक देना. भारतीय दंड संहिता मैकॉले का देश को अंग्रेजी शिक्षा से भी बड़ा उपहार था. यह एक ऐसा क़ानून था, जिसे 1830 के दशक में लिखा गया, जिसे तीस वर्ष बाद लागू किया गया. भारत में यह उस तरीके से चल रहा है, जैसे पिछले डेढ़ सौ सालों में कोई परिवर्तन ही नहीं आया है. इस दौरान ब्रिटेन में कई बार क़ानूनी क्रांति के जरिये परिवर्तन हुए. उसने अपने क़ानूनी तंत्र का आधुनिकीकरण किया, जिस पर मैकॉले का वर्जन आधारित था, लेकिन भारत अब भी वहीं फंसा हुआ है.
हाल में धारा 377, जो अप्राकृतिक सेक्स कोे दंडनीय अपराध मानती है, पर सुप्रीम कोर्ट ने देश के लिए फिर से मुहर लगा दी. एलजीबीटी समुदाय के लोग और उनके दोस्त यह चाहते थे कि इसे बदल दिया जाए. दुष्कर्म पर क़ानून निर्भया मामले के बाद फिर से बनाया गया. यह तभी संभव हो पाया, जब कई सारी बड़ी घटनाएं एक साथ हुईं. इसके लिए भीड़ ने काफी प्रदर्शन किए और ऐसे विशेषज्ञों ने रिपोर्ट बनाई, जो दयाभाव रखते थे और एक अनुपयोगी संसद ने इस पर क़ानून भी बना दिया, लेकिन धारा 377 के लिए ऐसी कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई गई. यही नहीं, सेक्शन 295-ए के भी मामले में यह संभावना नहीं है कि कोई बड़ा जनांदोलन चलाया जाए. यह सेक्शन किसी धार्मिक समुदाय की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने वाले भाषण को अपराध की श्रेणी में रखता है.
इसी क़ानून की वजह से पेंग्विन को वेंडी डोनिगर की किताब-द हिंदू ऐन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री को वापस लेनी पड़ी. अपने कर्मचारियों पर हमला हो सकने की आशंका को पेंग्विन ने एक बड़ा कारण बताया. पेंग्विन के इस क़दम में एक बात अंतर्निहित है कि जब बात धार्मिक उन्मादियों पर आती है, तो भारत अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर पाने में असक्षम साबित होता है. यहां यह भी कहा जा सकता है कि देश नहीं, बल्कि सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा कर पाने में विफल रहती है, चाहे वह किसी भी पार्टी की हो. वजह यह कि इन पार्टियों को किसी नागरिक के किताब प्रकाशित करने के अधिकार से ज़्यादा इस बात की चिंता होती है कि विशेष धार्मिक संप्रदाय का वोटबैंक न नाराज हो जाए और इसमें यह भी फ़़र्क नहीं पड़ता कि वह वोटबैंक कितना छोटा हो.
इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीते तीन दशकों के दौरान देश में हुआ धर्म का राजनीतिकरण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है. धर्मनिरपेक्षता का पाखंड सरकारों को इस बात की आज्ञा देता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर नागरिकों के अधिकारों का हनन हो. इन सब पर स़िर्फ सरकारी निष्क्रियता ही रही है. अब यह निष्क्रियता सार्वभौम हो चुकी है. इसके शिकार तस्लीमा नसरीन, एमएफ हुसैन एवं भंडारकर इंस्टीट्यूट पुणे के कर्मचारी हो चुके हैं और अब बारी पेंग्विन के कर्मचारियों की. भारत अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के शीर्ष देशों में नहीं रह गया है. हाल में जारी एक रैंकिंग के अनुसार, 200 देशों में भारत का 140वां स्थान है. तो सवाल यह है कि आख़िर अभी तक किया क्या गया? भारतीय दंड संहिता को जारी महत्व की पुनरीक्षा की जानी चाहिए. यह देखा जाना चाहिए कि किस पहलू को फिर से लिखे जाने की ज़रूरत है. यही नहीं, यह पूरी संहिता के लिए भी सही है कि डेढ़ सौ साल पुराने इन नियमों को बदला जाए. यह भी नहीं है कि स़िर्फ कुछ लोगों का ऐसा मानना है, बल्कि बहुत सारे लोगों को ऐसा लगता है कि देश का अपना क़ानून होना चाहिए.

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