पहले होते थे संसद में अच्छे सच्चे प्यारे लोग।
अब तो डाकू चोर लुटेरे ठग झूठे हत्यारे लोग।

भूखे प्यासे बेबस पैदल फिरते ये बेचारे लोग।
थाल बजाते दीप जलाते बेहिस अक़्ल के मारे लोग।

घूँघट बुर्क़े में रहते थे फूलों से भी प्यारे लोग।
उफ़ ये चौराहे चौराहे फिरते जिस्म उघारे लोग।

मोटू पतलू चंदामामा नंदन सरिता सत्यकथा।
गुलशननंदा इब्न-ए-सफ़ी थे पढ़ते आँख पसारे लोग।

अंग्रेज़ों से लड़ने तक तो मिलजुल कर रहते थे हम।
आज़ादी के बाद हुए हैं उनके लोग हमारे लोग।

अब वो अलगू चौधरी जुम्मन शेख़ सरीसे लोग कहाँ।
पंच को परमेश्वर कर देते थे दोनों ही प्यारे लोग।

आम नहीं होते थे क़लंदर साधू पीर फ़क़ीर मलँग।
अब तो स्वाँग रचाये भिखारी फिरते हाथ पसारे लोग।

इश्क़ सहाफ़त और सुख़न थे दीवानों के शौक़
‘विजय’।
अब तो बस दो चार छोड़कर व्यापारी हैं सारे लोग।

विजय तिवारी “विजय”

Adv from Sponsors