ssएक कहावत है कि कोई भी मुश्किल ऐसी नहीं है, जो आसान न हो जाए. बस किसी मुश्किल को आसान करने के लिए पक्के इरादे और लगन की जरूरत है. आज से बीस साल पहले राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र में एमआर मोरारका-जीडीसी रूरल रिसर्च फाउंडेशन ने एक मुश्किल काम अपने जिम्मे लिया था. ये काम था किसानों को रासायनिक खाद और पेस्टीसाइड रहित ऑर्गेनिक खेती के लिए तैयार करना. काम मुश्किल जरूर था, क्योंकि एक तो भारत में ऑर्गेनिक कृषि से हासिल उपज के लिए बाज़ार नहीं था, दूसरे ऑर्गेनिक खेती में शुरुआती कुछ वर्षों के दौरान उपज भी कम मिलने वाली थी. बहरहाल बड़ी मुश्किल से कुछ किसानों को ऑर्गेनिक खेती के लिए मोरारका फाउंडेशन ने राजी किया. इलाके में ऑर्गेनिक खेती शुरू हुई और किसानों की सफलता देख धीरे-धीरे दूसरे लोग भी इससे जुड़ते गए. अब तो आलम ये है कि उनकी संख्या जो कभी हजारों में हुआ करती थी, अब लाखों में चली गई है. फाउंडेशन आज देश के कई राज्यों में ऑर्गेनिक खेती को प्रोत्साहन और सहायता प्रदान कर रहा है. यह बात गौरतलब है कि सिक्किम भारत का पहला ऐसा राज्य बना है जिसे पूर्ण रूप से ऑर्गेनिक राज्य घोषित किया गया है. सिक्किम के पूर्ण ऑर्गेनिक राज्य बनाने में मोरारका फाउंडेशन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

देश में बड़े पैमाने पर ऑर्गेनिक खेती की जरूरत इसलिए है क्योंकि आज हर तरफ मुनाफाखोरी और जालसाजी का बाज़ार गर्म है. इस मुनाफाखोरी और जालसाजी की होड़ में खाने-पीने की चीज़ें भी शामिल हैं. आये दिन ऐसी ख़बरें देखने और पढ़ने को मिल जाती हैं कि फलों और सब्जियों को कैसे अधिक मुनाफा कमाने के उद्देश्य से कृत्रिम तरीके से तैयार किया जा रहा है. साथ ही दूध में कैसे मिलावट हो रही है? इस मिलावट के साथ, जो फसलों में रसायन और कीटनाशकों का प्रयोग होता है, वह भी सेहत के लिए अधिक नुकसानदेह है. हम अनजाने तौर पर खाने के साथ पेस्टीसाइड का भी इस्तेमाल करते हैं, जिसकी वजह से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. अमेरिका के वाशिंगटन स्थित सेंटर फॉर एकोगेंटिक्स एंड एनवायर्नमेंटल हेल्थ के एक अध्ययन के मुताबिक लंबे समय तक पेस्टीसाइड के संपर्क में रहने या पेस्टिसाइड युक्त खाना खाने से सांस की परेशानी, याद्दाश्त की समस्या, चर्म रोग, मनोरोग, गर्भपात, कैंसर आदि बीमारियां हो सकती हैं. हालांकि किसी अध्ययन में ये साबित नहीं हुआ है कि ऑर्गेनिक पद्धति से की गई खेती से हासिल अनाज, फल और सब्जी आम तरीके से उगाये गए अनाज, फलों और सब्जियों से अधिक पौष्टिक होते हैं, लेकिन एक बात तो तय है कि रसायन और पेस्टीसाइड का उपयोग नहीं होने के कारण ऑर्गेनिक पद्धति से उपजाए गए अनाज या सब्जियों का उपयोग करने से उपरोक्त बीमारियों की आशंका कम हो जाती है.

लिहाज़ा, इन्हीं चीज़ों को ध्यान में रखते हुए किसानों के हितों के लिए हर मोर्चे पर लड़ाई लड़ने वाले संगठन किसान मंच से जुड़े देश के विभिन्न क्षेत्रों से आये किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मंच के अध्यक्ष विनोद सिंह की अगुआई में शेखावटी का दौरा किया. यह प्रतिनिधिमंडल इस क्षेत्र में मोरारका फाउंडेशन के तत्वावधान में कामयाबी के साथ चल रही ऑर्गेनिक खेती को देखने और अपने इलाकों में ऑर्गेनिक खेती की संभावनाएं तलाशने यहां आया था. इन किसानों ने जहां एक तरफ नवलगढ़ और शेखावटी क्षेत्र में ऑर्गेनिक खेती कर रहे किसानों से मुलाक़ात कर खेती में इस्तेमाल हो रहे तकनीक का प्रत्यक्ष जायजा लिया, वहीं मोरारका फाउंडेशन के कृषि विशेषज्ञों से भी लंबी मुलाकात की और ऑर्गेनिक खेती के अलग-अलग पहलुओं पर चर्चा की. दरअसल इन किसानों में से कई ऐसे थे जिन्होंने क्षेत्र में अपने इस्तेमाल के लिए रासायनिक खाद रहित खेती की शुरुआत की है.

सीधी (मध्य प्रदेश) के युवा किसान रणजीत सिंह चौहान, जो एमबीए हैं और किसान मंच से जुड़े हैं, अपनी यात्रा के बारे में बताते है कि मैं यहां ऑर्गेनिक खेती के बारे में जानकारी लेने के लिए आया था. हमारे यहां खेती में पेस्टिसाइड और रासायनिक खाद का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है. मैं 150 एकड़ ज़मीन पर खेती करता हूं. अभी तक हम केमिकल फ़र्टिलाइज़र ही इस्तेमाल करते रहे हैं और इसलिए मेरी इच्छा ऑर्गेनिक खेती के बारे में जानने की थी. यहां का अनुभव बहुत अच्छा रहा. आदमी घर पर ही कंपोस्ट बना सकता है और उसी से कीटनाशक बनाकर खेती कर सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है. मैंने यहां जो चीज़ें सीखी हैं, उसे अपने यहां जाकर करूंगा और धीरे-धीरे ऑर्गेनिक खेती से अनाज पैदा कर बाजार में उतारने की कोशिश करूंगा.

नागपुर से आए प्रताप गोस्वामी, जो किसान मंच की स्थापना से जुड़े हैं और पेशे से इंडस्ट्रियल कंसल्टेंट (बम्बू प्रोसेसिंग, ़फूड प्रोसेसिंग) हैं, बताते हैं कि विदर्भ के किसानों की हालत काफी दयनीय है. वहां ज़्यादातर किसान बुरे हालत में जीने को मजबूर हैं. यह कपास का बेल्ट है. 2002 के पहले कपास के बेल्ट में बहुत खुशहाली थी. एक ज़माना ऐसा था, जब एक तोला सोना और एक क्विंटल कपास की कीमत एक थी लेकिन आज कपास 3000 रुपए क्विंटल है और सोना 30000 रुपए के आस-पास है. कपास में बीटी कॉटन आने के बाद ये सब समस्याएं शुरू हुईं. विदर्भ के 11 जिलों में से 6 कपास उत्पादन के लिए जाने जातेे हैं. यहां रासायनिक खाद और कीटनाशकों का बहुत ज्यादा प्रयोग होता है, जिसकी वजह से किसानों की लागत काफी बढ़ जाती है और सिंचाई की कमी होने से किसान बहुत तकलीफ में हैं. यहां मैंने किसानों को ड्रिप पद्धति से सिंचाई करते देखा, इससे निश्‍चित तौर पर पानी की खपत कम होगी. यहां के जैविक मॉडल और खाद के बारे में भी बेहतर जानकारी मिली. यहां पशुओं के गोबर और घर में इस्तेमाल होने वाली चीज़ों से कीटनाशक तैयार किए जाते हैं. ये सब नई चीज़ें सीखने को मिली हैं और इन चीज़ों को हम विदर्भ में भी किसानों को समझाएंगे. वहां के किसान भी इस तकनीक का फायदा उठा कर खुशहाल हो सकते हैं और अपनी समस्याओं से निजात पा सकते हैं. हम मोरारका फाउंडेशन के माध्यम से वहां इन   चीज़ों का प्रसार करेंगे. आर्थिक लाभ होने के कारण वहां के किसान इसका जल्द अनुसरण करेंगे.

नागपुर जिला किसान मंच से जुडे उल्लास धापाडेकर कहते हैं कि मैं पिछले कुछ वर्षों से खेती कर रहा हूं. इसमें मेरा  तजुर्बा है कि रासायनिक खाद और कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों का एक चेन है. मुझे लगता है कि जो खाद हम इस्तेमाल करते हैं, वह फसल में मीठापन पैदा करता है, जिसके कारण कीट फसलों की तरफ आकर्षित होते हैं. इसकी वजह से खाद के साथ-साथ पेस्टिसाइड की भी ज्यादा खपत होती है. इसकी वजह से किसान को फसल की कम कीमत मिल पाती है. मैंने देखा कि जो लोग यहां खेती कर रहे हैं, जैसे गाय के गोबर से खाद बना रहे हैं, वो काबिले तारीफ है और यह पेस्टिसाइड का तोड़ भी है. हम लोग धीरे-धीरे ऑर्गेनिक खेती की ओर आने की कोशिश करेंगे.

औरंगाबाद, महाराष्ट्र के धनंजय पाटील बताते हैं कि हमारे यहां प्याज की खेती अब किसानों के लिए नुकसान का कारण बन रही है. आज हमारा प्याज 50 पैसे किलो के हिसाब से बिक रहा है. गन्ने की खेती भी अब किसानों के लिए फायदे का सौदा नहीं रही है. कृषि क्षेत्र के प्रति सरकार की उदासीनता को देखकर ऐसा लगता है कि अब किसानों को खुद ही वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल कर खेती में सुधार लाना होगा. हम किसान मंच के तत्वावधान में इसी नीयत से यहां नवलगढ़ में ऑर्गेनिक खेती देखने आये थे. यहां मैंनेे देखा कि यहां पूरी तरह से ऑर्गेनिक तरीके का इस्तेमाल कर बाजरा का उत्पादन किया जाता है जो डेयरी फार्मिंग के लिए अच्छा है.

किसान मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनोद सिंह कहते हैं कि किसान मंच, जिसके संरक्षक कमल मोरारका जी हैं, किसान मंच और मोरारका फाउंडेशन दोनों एक ही सिलसिले की कड़ी हैं. यहां देश के कोने-कोने से जो भी किसान आए हैं वे अपने क्षेत्र में जाकर वहां ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत करने जा रहे हैं. किसान मंच पूरे देश में मोरारका फाउंडेशन के साथ   किसानों को ऑर्गेनिक खेती की ट्रेनिंग देगा. यह किसानों के एक समूह को सफलतापूर्वक ऑर्गेनिक खेती के बारे में जानकारी देने का पहला चरण था. आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में किसानों को प्रशिक्षित करने के लिए किसान मंच और मोरारका फाउंडेशन किसानों के बीच जाकर ऑर्गेनिक खेती की ट्रेनिंग देगा और किसानों को खेती करने के लिए प्रेरित करेगा. किसान मंच केवल किसानों की समस्याओं के लिए आंदोलन ही नहीं करता है, बल्कि किसानों की दशा और दिशा बदलने के लिए भी काम करता है.

किसान मंच की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हरियाणा की निशा वर्मा बताती हैं कि किसान ऑर्गेनिक खेती के लिए तैयार तो हैं लेकिन उन्हें इसकी जानकरी नहीं है. मेरा यहां आने का मक़सद सिर्फ यह था कि मैं अपने क्षेत्र में जाकर वहां के किसानों को ऑर्गेनिक खेती के लिए प्रेरित कर सकूं. हम देख रहे हैं कि लंबे समय तक यूरिया के इस्तेमाल से हमारी खेती चौपट हो रही है. यहां मैंने देखा कि किसान कम लागत पर ही खाद तैयार कर सकते हैं और हम पुरातन खेती की तरफ एक बार फिर लौट सकते हैं.

उम्मीद है कि एक दिन ऐसा होगा जब किसी किसान को अपने ऑर्गेनिक खेती को सर्टिफाई या सत्यापित करवाने की आवश्यकता नहीं होगी और अधिकतर किसान अपने खेतों में ज़हर डालना बंद कर देंगे. मोरारका फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक मुकेश गुप्ता ने किसानों से कुछ रोचक जानकारियां साक्षा की. रासायनिक खाद के इस्तेमाल के बारे में वे कहते हैं कि रासायनिक खाद का इजाद खेती के लिए नहीं किया गया था. द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान गिराए गए बमों में नाइट्रोजन का इस्तेमाल होता था. युद्ध समाप्ति के बाद जब किसानों ने अपने खेत बोए तो जहां बम गिरे थे वहां की फसल सामान्य से अच्छी हुई. इसके बाद यूरिया के रूप में नाइट्रोजन का इस्तेमाल होने लगा. पेस्टीसाइड की कहानी भी कुछ ऐसी ही है.

ऑर्गेनिक खेती के अलावा मोरारका फाउंडेशन किसानों, छात्रों व महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाएं भी चला रहा है. एमआर मोरारका-जीडीसी रूरल रिसर्च फाउंडेशन किसानों को न सिर्फ जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, बल्कि उनके लिए बाज़ार की सुविधा भी उपलब्ध करा रहा है. महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सैकडों स्वयं सहायता समूह, सांझा रसोई गैस योजना चलाई जा रही है. किसान ऑर्गेनिक नर्सरी, डेयरी के अलावा राजस्थान जैसे क्षेत्र में मत्स्य पालन भी कर रहे हैं. फाउंडेशन ने छात्रों के लिए ई-लाइब्रेरी की सुविधा भी उपलब्ध कराई है. मोरारका फाउंडेशन ऑर्गेनिक खेती को राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र के साथ-साथ देश के कई अन्य राज्यों में भी फ़ैलाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है.

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