क्या हमारी दुनिया सचमुच अंधेरी और अंधी होती जा रही है? हमारी दुनिया से मतलब हम पत्रकारों की दुनिया से है. हम इसलिए यह बात उठा रहे हैं क्योंकि पत्रकारों को अलिखित अधिकार मिले हैं जिनका सभी सम्मान करते हैं. लोकतंत्र की सर्वमान्य धारणा है कि विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका की तरह मीडिया भी समान अधिकार संपन्न क्षेत्र है और उसे तीनों पर सार्थक और सही टिप्पणी का अधिकार है. किसी को भी कहीं भी रोक कर सवाल पूछने का हक़ सिर्फ पत्रकारों का माना गया है और लोग भी उस हक़ की इज्ज़त करते हैं. आम लोगों के बीच अब तक यह विश्वास बना हुआ है कि जब कहीं भी उनकी सुनवाई न हो, कोई भी बात नहीं सुने तो पत्रकारों के पास चले जाओ. वे ज़रूर बात सुनेंगे और जब छापेंगे या दिखाएंगे, तो सरकार का वह व्यक्ति जो उनके दुख-का जिम्मेदार है, जवाब देने को मजबूर होगा. हम इन कसौटियों से जुड़े अधिकारों का तो जम कर उपयोग करते हैं, लेकिन उसकी जिम्मेदारियां नहीं उठाते. इन जिम्मेदारियों को न उठाने का परिणाम अपने सबसे बुरे स्वरूप में हमारे सामने आ रहा है. पहले कहा जाता था कि थोड़ी शराब पिला दो और जो चाहे लिखवा लो. धीरे-धीरे बात काम कराने की, ठेकेदारी तक पहुंच गई और आज हमारे ही पेशे के कई बड़े और छोटे साथी काम कराने का ठेका लेने लगे हैं. चाहे अक्षरों की दुनिया हो या तस्वीरों की दुनिया, गंदी मछलियां हर जगह दिखाई दे रही हैं. पीआर जर्नलिज्म की एक नई श्रेणी पैदा हो गई है जो राजनैतिक दलों या बड़े घरानों को सलाह देती है कि कैसे उन्हें अपनी ताकत और साख बढ़ानी चाहिए. जब चुनाव आते हैं, तो चाहे बड़े पत्रकार हों या छोटे, वे अपने-दलों के रणनीतिकार में तब्दील हो जाते हैं. वे अपनी टोली बनाते हैं और प्रचार का हिस्सा बन जाते हैं. सबसे बुरी हालत तो अब हो गई है. पिछले आम चुनाव से यह बीमारी खुले आम सामने आ गई है और कोई इसे छिपाना नहीं चाहता. अखबारों ने और टेलीविजन चैनलों ने अपने संवाददाताओं से कहा कि आप उम्मीदवारों से पैसे लीजिए और उनकी रिपोर्ट छापिए या दिखाइए. एक संपादक जो मालिक हैं, उन्होंने अपने संवाददाताओं से भरी मीटिंग में कहा कि हम जानते हैं कि आप लोग चुनावों में लिखने का पैसा लेते हैं. अब आप हमारे बताए रेट पर पैसा लीजिए और अपना कमीशन उसमें से लीजिए. मीटिंग में मौजूद एक भी संवाददाता ने प्रतिवाद नहीं किया कि वे ऐसा नहीं करते. बड़े राजनैतिक दल टेलीविजन के बड़े पत्रकारों को व्यक्तिगत रूप से और चैनलों को संस्था के रूप में मोटी रकम देते हैं ताकि वे उनके बारे में प्रचार न करें तो कोई बात नहीं, लेकिन हानि पहुंचाने वाली रिपोर्ट तो न ही दिखाएं. अगर कोई अखबार या चैनल इससे इनकार करता है, तो हम उसे अपवाद मान कर अपनी गलती की क्षमा मांग लेंगे. पर यदि सभी ऐसा करते हैं, तो हमें इस कहानी के विद्रूप स्वरूप को सामने लाने का हक़ होगा. इस सारे क्षरण में आम आदमी की तकलीफें हमारे एजेंडे से गायब हो गई हैं और परिणाम सामने आ रहा है कि वह हम पर विश्वास खोता जा रहा है. यह अजीब अंतर्विरोध है कि जिसके लिए मीडिया की बुनियादी प्रतिबद्धता है, वही मीडिया पर भरोसा नहीं करता या कम भरोसा करने लगा है. प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट और पत्रकार सुधीर तैलंग जब मिलने आए, तो व्यथा से बोले कि पिछले पांच सालों की पांच ऐसी रिपोर्टें याद नहीं आ रही हैं जिनका संबंध आम लोगों से रहा हो. संतोष तिवारी मिलने आए तो कहने लगे कि इतनी ज्यादा घुटन है कि नौकरी छोड़ने का मन कर रहा है. साथ ही कहा कि पत्नी का कहना है कि पत्रकारिता करो, नहीं तो तुम टूट जाओगे. ऐसे नामों की लंबी फेहरिस्त है, पर सवाल है कि आखिर यह स्थिति आ क
्यों रही है. क्यों खबर से, खबर तलाशने की मेहनत से, पाठक को सही बात बतलाने से और पाठक के पक्ष में खड़े होने से हम घबरा रहे हैं. किसका दबाव पत्रकारिता के पेशे पर है, क्या बाज़ार हमें यह कहता है कि समाचार या जो घट रहा है, उसे न दिखाएं या छापें. क्या मालिक संपादकों को इसके लिए विवश कर रहे हैं या संपादक ही पत्रकारों को समाचार के अलावा सब कुछ लिखने या दिखाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. मेरा मानना है कि जितना हम अपने कर्तव्य से दूर जाएंगे, उतना हम देश को खतरे में डालेंगे.जितना ज्यादा समाचारों का या जानकारी का संप्रेषण सीमित होगा, उतना ही देश में अविश्वास बढ़ेगा. यह अविश्वास वर्गों के बीच का हो सकता है, धर्मों के बीच का हो सकता है, जातियों के बीच का हो सकता है और जनता तथा सरकार के बीच का हो सकता है. और यहीं मीडिया का रोल आता है कि वह यह सब न होने दे. अगर मीडिया की चूक, भूल या जान-बूझ कर की गई गलती की वजह से अविश्वास बढ़ता है तथा हम अराजकता की ओर बढ़ते हैं, तो इसका सबसे पहला असर हम पर यानी मीडिया पर ही पड़ने वाला है. अगर सत्ता को हमने यह अहसास करा दिया कि हम मैनेज हो सकते हैं, तो हमें आगे सेंसरशिप के लिए तैयार रहना चाहिए. और यदि विपक्ष को हमने यह संकेत दिया कि हम आसानी से प्रभावित किए जा सकते हैं, तो हमें गोली और लाठी से दबने की दिमागी तैयारी रखनी चाहिए. संपादकों, पत्रकारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों को अगर अब भी संभलना न आया या उन्होंन संभलना ना चाहा, तो अगले पांच साल यानी पंद्रहवीं लोकसभा के कार्यकाल के बाद उन्हें संभलने का मौका ही नहीं मिलेगा. लोकतंत्र के नाम पर ऐसी ताकतें सामने आ रही हैं, जिनका लोकतंत्र में भरोसा ही नहीं है. उसी तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी पैठ बढ़ रही है जो पत्रकारिता के सिद्धांतों को तोड़ने में अपनी शान समझते हैं. अगर गांधीजी और सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन पर उनकी याद मीडिया को ना आए, तो मानना चाहिए कि हमारा यानी मीडिया का नेतृत्व लिलिपुटियंस के या बौने पत्रकारों के हाथ में है. पर ऐसे पत्रकारों की भी कमी नहीं है जो खामोश तो हैं, पर वे ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं.इन सब को मिल कर अपने-अपने संस्थानों में आवाज़ बुलंद करनी होगी और बौने पत्रकारों को उनका धर्म याद कराना होगा. एक वक्त ऐसा आता है जब बोलना परम कर्तव्य बन जाता है और पत्रकारिता के क्षेत्र में चल रही अराजक स्थिति, ग़लत परिभाषा और पत्रकारिता की बुनियाद को हिलाने वाली गतिविधयों के विरुद्ध हाथ उठाना ऐतिहासिक कर्तव्य बन जाता है. हमें ऐसी ही तोपों का मुकाबला करना है और ऐसे दोस्तों की तलाश भी करनी है जो तोप का मुकाबला करने में न केवल साथ दें, बल्कि नेतृत्व भी करें.      —–इंदिरा गांधी के पोते  वरुण गांधी को जानें—-
अब वरुण गांधी कहते हैं कि वे हिंदू हैं. हिंदू उनका धर्म है. तो क्या वरुण गांधी ने अपना धर्म बदल लिया है या वे अपने पिता और दादा के  धर्म को गलत मानते हैं? इसका जवाब केवल वरुण दे सकते हैं, जो हिंदू धर्म में आकर मुसलमानों के  हाथ काटने या उन्हें ओसामा बिन लादेन जैसे नाम से तुलना कर खतरनाक बता रहे हैं. इतना ही नहीं, वह मुस्लिम औरतों के  नाम, जिनके आगे खातून लगा है, डरावने बता रहे हैं.  दरअसल अब वरुण जवाहर लाल नेहरू,  इंदिरा गांधी और शायद अपने पिता की राजनीतिक समझ को खारिज कर रहे हैं और करें भी क्यों न, जब उन्हें महात्मा गांधी ही बेवकूफ नज़र आ रहे हों. जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में उनके  नाना, उनके  दादा, उनकी दादी, उनके  परदादा तक को न केवल सीख दी बल्कि आगे बढ़ाया. गांधी जी न होते तो नेहरू जी प्रधानमंत्री न होते और नेहरु जी न होते, तो कौन वरुण गांधी को जानता. जब वरुण कहते हैं कि गांधी का कहना कि एक गाल पर कोई थप्पड़ मारे तो अपना दूसरा गाल आगे बढ़ा दो, इससे बड़ी बेवकूफ बात मैंने सुनी ही नहीं. मैं इसे नहीं मानता. जो तुम्हारे गाल पर थप्पड़ मारे, तुम उसका हाथ तोड़ दो. वरुण गांधी की अज्ञानता का पता इसी मे चलता है कि उन्हें नहीं पता कि यह वाक्य ईसा मसीह ने पहले कहा और महात्मा गांधी ने उसे अपने जीवन में उतार देश में अहिंसा का पर्यायवाची बना दिया.

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