DSC05533अब तक हमने लगातार जंग लड़ी है और उसे जीता है. इस बार भी हम एक होकर निर्णायक लड़ाई लड़ेंगे और गंगा की अविरलता नष्ट नहीं होने देंगे. यह कहना है, बिहार के भागलपुर ज़िले के कहलगांव स्थित कागजी टोला की फेकिया देेवी का. वह पिछले दिनों गंगा पर बैराज बनाने की साजिश के विरोध में भागलपुर ज़िला मुख्यालय में गंगा मुक्ति आंदोलन के प्रदर्शन में हिस्सा लेने आई थीं. फेकिया देेवी उस आंदोलन की गवाह हैं, जिसने दस वर्षों तक अहिंसात्मक संघर्ष करके गंगा को जलकर जमींदारी से मुक्त कराने में कामयाबी हासिल की. बिहार में आने वाले दिनों में गंगा के सवाल पर निर्णायक लड़ाई का आगाज एक साझा मंच बनाकर होने वाला है, जिसकी दस्तक इस विरोध प्रदर्शन के माध्यम से दी गई. इस आंदोलन का केंद्र भागलपुर बनेगा. प्रदर्शन से पूर्व पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह की बक्सर, आरा, छपरा, पटना, मुंगेर एवं भागलपुर में सभाएं, बेगूसराय के सिमरिया घाट पर स्वामी चिदात्मन जी महाराज द्वारा राष्ट्रीय पत्रकार समागम और तापस दास के नेतृत्व में गोमुख से गंगा सागर तक साइकिल यात्रा का स्पष्ट संदेश है कि गंगा की अविरलता कायम रहने से ही गंगा पर आश्रित समुदाय कायम रह सकेगा.
बिहार और झारखंड में सबसे अधिक लंबा प्रवाह मार्ग गंगा का है. शाहाबाद के चौसा से संथाल परगना के राजमहल और वहां से आगे गुमानी तक गंगा का प्रवाह 552 किलोमीटर लंबा है. गंगा जब सबसे पहले बिहार की सीमा छूती है, तब वह बिहार और उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले की 72 किलोमीटर सीमा बनाकर चलती है. जब वह केवल बिहार से होते हुए बीच भाग से हटने लगती है, तब बिहार-झारखंड में 64 किलोमीटर सीमा रेखा बनकर गुजरती है. 416 किलोमीटर तक तो गंगा बिल्कुल बिहार एवं झारखंड की भूमि में ही अपना जल फैलाती है और उसकी भूमि शस्य श्यामला करती हुई बहती है. मछुआरों, किसानों, नाविकों एवं पंडितों की जीविका का आधार है गंगा. गंगा के किनारे बसे मछुआरों ने गंगा को प्रदूषित होते देखा है, उसकी दुर्दशा देखी है और उसे बनते देखा है. 1993 के पहले गंगा में जमींदारों के पानीदार थे, जो गंगा के मालिक बने हुए थे. सुल्तानगंज से लेकर पीरपैंती तक 80 किलोमीटर के क्षेत्र में जलकर जमींदारी थी.
यह जमींदारी मुगल काल से चली आ रही थी. सुल्तानगंज से बरारी के बीच जलकर गंगा पथ की जमींदारी महाशय घोष की थी. बरारी से लेकर पीरपैंती तक मकससपुर की आधी-आधी जमींदारी क्रमश: मुर्शिदाबाद (पश्‍चिम बंगाल) के मुशर्रफ हुसैन प्रमाणिक और महाराज घोष की थी. हैरत की बात तो यह थी कि जमींदारी किसी आदमी के नहीं, बल्कि देवी-देवताओं के नाम पर थी. और देवता थे श्री श्री भैरवनाथ जी, श्री श्री ठाकुर वासुदेव राय, श्री शिव जी एवं अन्य. कागजी तौर पर जमींदार की हैसियत केवल सेवायत की रही है. 1908 के आसपास दियारे की ज़मीन का काफी उलट-फेर हुआ. जमींदारों की ज़मीन पर लोगों ने कब्जा कर लिया. किसानों में आक्रोश फैला. संघर्ष की चेतना से पूरे इलाके में फैले जलकर जमींदार भयभीत हो गए और उन्होंने 1930 के आसपास इसे ट्रस्ट बनाकर देवी-देवताओं के नाम कर दिया. जलकर जमींदारी ख़त्म करने के लिए 1961 में एक कोशिश की गई. भागलपुर के तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर ने इसे ख़त्म कर मछली बंदोबस्ती की जवाबदेही सरकार पर डाल दी.
मई 1961 में जमींदारों ने इसके ख़िलाफ़ उच्च न्यायालय में अपील की और अगस्त 1961 में उन्हें स्थगनादेश मिल गया. 1964 में उच्च न्यायालय ने जमींदारों के पक्ष में ़फैसला सुनाया कि जलकर जमींदारी मुगल बादशाह ने दी थी और जलकर के अधिकार का प्रश्‍न ज़मीन के प्रश्‍न से अलग है, क्योंकि यह ज़मीन की तरह अचल संपत्ति नहीं है. इसलिए यह बिहार भूमि सुधार क़ानून के अंतर्गत नहीं आता. बिहार सरकार ने इस ़फैसले के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की और स़िर्फ एक व्यक्ति मुशर्रफ हुसैन प्रमाणिक को पार्टी बनाया गया. चार अप्रैल, 1982 को अनिल प्रकाश के नेतृत्व में कहलगांव के कागजी टोला में जल श्रमिक सम्मेलन हुआ और इसी दिन जलकर जमींदारों के ख़िलाफ़ संगठित आवाज़ उठी. साथ ही सामाजिक बुराइयों से भी लड़ने का संकल्प लिया गया. पूरे क्षेत्र में शराब बंदी लागू की गई. धीरे-धीरे यह आवाज़ उन सवालों से जुड़ गई, जिनका संबंध गंगा और उसके आसपास बसने वालों की आजीविका, स्वास्थ्य एवं संस्कृति से था. जमींदारों ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए कई हथकंडे अपनाए, लेकिन आंदोलनकारी अपने संकल्प-हमला चाहे कैसा भी हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा पर अडिग होकर निरंतर आगे बढ़ते रहे. नतीजा यह हुआ कि 1988 में बिहार विधानसभा में मछुआरों के हितों की रक्षा के लिए जल संसाधनों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का प्रस्ताव लाया गया. गंगा मुक्ति आंदोलन के साथ समझौते के बाद राज्य सरकार ने नदियों-नालों और सारे कोल-ढाबों को जलकर से मुक्त घोषित कर दिया.
पूरे बिहार में दबंग जल माफिया और ग़रीब मछुआरों के बीच जगह-जगह संघर्ष की स्थिति बनी हुई है. गंगा एवं कोशी में बाढ़ का पानी घट जाने के बाद कई जगह चौर बन जाते हैं. ऐसे स्थानों को मछुआरे मुक्त मानते हैं, जबकि भू-स्वामी अपनी संपत्ति. जिनकी ज़मीन जल में तब्दील हो जाती है, उन्हें सरकार की ओर से मुआवजा नहीं मिलता. इसलिए भू-स्वामी उसका हर्जाना मछुआरों से वसूलना चाहते हैं. राज्य के कटिहार, नवगछिया, भागलपुर, मुंगेर और झारखंड के साहेबगंज में दो दर्जन से ज़्यादा अपराधी गिरोह इस कार्य में सक्रिय हैं, जिनकी कमाई हर साल करोड़ों में है. गंगा मुक्ति आंदोलन लगातार प्रशासन से दियारा क्षेत्र में नदी पुलिस की तैनाती और मोटर वोट द्वारा पेट्रोलिंग की मांग करता रहा है, लेकिन ऐसा अभी तक संभव नहीं हो सका. भागलपुर विश्‍वविद्यालय के प्राध्यापक केएस बिलग्रामी एवं जेएस दत्ता मुंशी के अध्ययन से पता चलता है कि बरौनी से लेकर फरक्का तक 256 किलोमीटर की दूरी में मोकामा पुल के पास गंगा नदी का प्रदूषण भयानक है. गंगा एवं अन्य नदियों के प्रदूषित होने का सबसे बड़ा कारण है, कल-कारखानों के जहरीले रसायनों को नदी में गिराया जाना. कल-कारखानों, थर्मल पावर स्टेशनों का गर्म पानी और जहरीला रसायन नदी के पानी को जहरीला बनाने के साथ-साथ नदी के स्वयं शुद्धिकरण की क्षमता नष्ट कर देता है. उद्योगों प्रदूषण के कारण गंगा एवं अन्य नदियों में कहीं आधा किलोमीटर, कहीं एक किलोमीटर, तो कहीं दो किलोमीटर के डेड जोन मिलते हैं. कटैया, फोकिया, राजबम, थमैन, झमंड, स्वर्ण खरैका, खंगशी, कटाकी, डेंगरास, करसा गोधनी एवं
देशारी जैसी 60 देसी मछलियों की प्रजातियां लुप्त हो गई हैं.
गंगा मुक्ति आंदोलन से जुड़ी कहलगांव निवासी मुन्नी देवी बताती हैं कि फरक्का बैराज बनने के बाद से गंगा में समुद्र से मछलियां नहीं आ रही हैं. वहीं अनिल प्रकाश कहते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार ने गंगा पर 16 बैराज बनाने के ़फैसले से पहले फरक्का बैराज के दुष्परिणामों पर ग़ौर क्यों नहीं किया? 1971 में पश्‍चिम बंगाल में फरक्का बैराज बना और 1975 में उसकी कमीशनिंग हुई. जब यह बैराज नहीं था, तो हर साल बरसात के तेज पानी की धारा के चलते 150 से 200 फीट गहराई तक प्राकृतिक रूप से गंगा नदी की उड़ाही हो जाती थी. जब से फरक्का बैराज बना, सिल्ट की उड़ाही की यह प्रक्रिया रुक गई और नदी का तल ऊपर उठता गया. जब नदी की गहराई कम होती है, तो पानी फैलता है और कटाव एवं बाढ़ के प्रकोप की तीव्रता बढ़ाता जाता है. मालदह-फरक्का से लेकर बिहार के छपरा, यहां तक कि बनारस तक इसका दुष्प्रभाव दिखता है. झींगा जैसी मछलियों की ब्रीडिंग समुद्र के खारे पानी में होती है, जबकि हिलसा जैसी मछलियों का प्रजनन ॠषिकेश के ठंडे मीठे पानी में होता है. अब यह सब प्रक्रिया रुक गई और गंगा एवं सहायक नदियों में 80 प्रतिशत मछलियां समाप्त हो गईं.
पश्‍चिम बंगाल, बिहार एवं उत्तर प्रदेश में अब आंध्र प्रदेश से मछलियां आती हैं. मछलियों से अपनी जीविका चलाने वाले लाखों मछुआरे बेरोज़गार हो गए. फरक्का बैराज बनने से उत्तर बिहार में गंगा किनारे दियारा इलाके में बाढ़ स्थायी हो गई और बाढ़ प्रभावित इलाके का रकबा बढ़ गया. बिहार में फतुहा से लेकर लखीसराय तक 100 किलोमीटर लंबाई एवं 10 किलोमीटर की चौड़ाई के क्षेत्र में जलभराव की समस्या है. बाढ़ क्षेत्र में बढ़ोतरी का सबसे ज़्यादा असर मुंगेर, नवगछिया, कटिहार, पूर्णिया, सहरसा एवं खगड़िया में पड़ा. फरक्का बैराज की घटती जल निस्तारण क्षमता के चलते गंगा एवं सहायक नदियों का पानी विपरीत दिशा में लौटकर बाढ़ और जलभराव क्षेत्र को बढ़ा देता है. मालदा एवं मुर्शिदाबाद का लगभग 800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की उर्वरा भूमि कटाव की चपेट में आ गई और एक बड़ी आबादी का विस्थापन हुआ.

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