pix-02जरा सोचिए, प्रधानमंत्री पद के तीन मुख्य दावेदार या सात दावेदार आज़ादी यानी 1947 के बाद पैदा हुए हैं सिवाय प्रधानमंत्री पद की उम्मीद लगाए बैठे लालकृष्ण आडवाणी, शरद पवार और मुलायम सिंह यादव के. बाकी सब स्वतंत्र भारत के बच्चे हैं. मतदाताओं का बहुमत भी 1947 और आपातकाल के बाद ही पैदा हुआ है. राजीव गांधी 1991 में रहते और प्रधानमंत्री बनते, तो भारतीय राजनीति युवा पीढ़ी में स्थानांतरित हो गई होती, लेकिन वह वक्त खो चुका है. अपने पिता के असामयिक निधन से कुछ युवराज आगे आए, लेकिन कांग्रेस में वे शीर्ष पद पर नहीं आ सके, क्योंकि यहां पर जगह पहले से ही भरी हुई थी. जनता पार्टी आंदोलन ने राजनीति में छात्रों को लाने का काम किया. इसलिए हमारे पास बिहार में लालू प्रसाद (1948 में जन्म) और नीतीश कुमार (1951 में जन्म) हैं, नरेंद्र मोदी (1950 में जन्म) हैं, जबकि  अरविंद केजरीवाल (1968 में जन्म) और राहुल गांधी (1970 में जन्म) अभी बच्चे हैं.मायावती (1956 में जन्म), ममता बनर्जी (1955 में जन्म) और जयललिता (1948 में जन्म) भी प्रधानमंत्री पद के लिए तीन महिला दावेदार हैं. ये लोग वक्त को बदल रहे हैं.
यह केवल उम्र नहीं है, जो नया तत्व है, रुख भी अलग हैं. पुराना भारत बाहर की दुनिया के बारे में अनिश्‍चित था. जहां तक पश्‍चिम से संबंध की बात थी (और जिसके बारे में भारतीय परवाह भी नहीं करते), भारतीयों ने हमेशा समर्थन दिया. हमेशा से बाहर की दुनिया का भारत के ख़िलाफ़ एकजुट होने या गलत तरीके से मजबूत होने को लेकर एक अतिरंजित भय था. यंग इंडिया को यह डर नहीं है. दुनिया बस एक छोटी दूरी की हवाई यात्रा है और वह न्यूयॉर्क में किसी भी बहुराष्ट्रीय कंपनी का प्रबंधन अपने पिता की किराना दुकान की तरह कर सकता है. युवा भारत यह नहीं सोचता कि वह ऐसा कुछ नहीं कर सकता. इसके पास ऐसे रोल मॉडल भी हैं. इंद्रा नूई हैं, सत्या नाडेला उसके प्रतिनिधि हैं. घर में विश्‍वनाथन आनंद और सचिन तेंदुलकर हैं.
राजनीति का भारत के साथ ऐसा संबंध नहीं है. यह अभी भी वहां है, जहां हम बाज़ार को संदेह की नज़र से देखते हैं. भारत सरकार की नीति और उद्योग राज्य के स्वामित्व में हों, इसमें लोगों का विश्‍वास है. नतीजा हम क्रोनी सोशलिज्म और क्रोनी कैपिटलिज्म के रूप में देखते हैं. एक बीपीएल परिवार को एक रुपये की सब्सिडी की क़ीमत तीन रुपये होती है. कोल इंडिया और भारतीय खाद्य निगम के साथ ही कई पीएसयू बैंक बैड लोन (मुख्य रूप से राजनेताओं को दिए गए) के बोझ से दबे हुए हैं. ये सब हमें भ्रष्टाचार और अक्षमता की एक कहानी बताते हैं. युवा भारत को बाज़ारों का डर नहीं है. वह क़ीमतों के बारे में ऑनलाइन जानकारी रखता है. पुराना भारत, विशेष रूप से सबसे पिछड़े इलाकों में, जाति की राजनीति और वोट बैंक के मामले में सोचता है. युवा भारत की आकांक्षा है और वह प्रतिस्पर्धा करना चाहता है. वह बीपीएल एवं समावेशी विकास को लेकर जल्दबाजी में है. पुरानी भारतीय राजनीति नेताओं के संरक्षण के बारे में है. यंग इंडिया अपनी आवश्यकता और वास्तविक दावे पूरा होते देखना चाहता है. वह राजनीति को भ्रष्टाचार से बाहर होता देखना चाहता है. वह एक कुशल मशीन चाहता है, न कि एक खानदानी मशीन.16 मई के बाद निर्वाचित सरकार के पास भविष्य के इस भारत को जवाब देने का अवसर है. एक अवसर है पुरानी राजनीति और थकी हुई मान्यताओं को बदलने का. अक्षम सांख्यवाद, राजनीतिक दलों में अलोकतांत्रिक प्रथाओं और पार्टी के वित्त पोषण के बारे में चुप्पी बदलने का भी अवसर यह चुनाव देगा. अगर सख्त क़दम उठाए गए, तो न केवल राज्य के स्वामित्व वाले बैंकों एवं कंपनियों की मरणासन्न संरचनाओं को नष्ट होने से बचाने का मौक़ा मिलेगा, बल्कि भाई-भतीजावाद वाली व्यवस्था से मुक्त होने का भी. भारतीय राज्य को अपनी संपत्ति से खुद को मुक्त करना चाहिए. यदि और कुछ नहीं, तो इससे ब्याज प्रभार के बोझ को, जो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च की जाने वाली रकम का दस गुना है, कम किया जा सकता है.
भारत में ऐतिहासिक काल से एक खुली ट्रेडिंग अर्थव्यवस्था रही है. ब्रिटिश सरकार ने 20वीं सदी में सांख्यिकीविद् नीतियों को हमसे रूबरू कराया. लाइसेंस और नियंत्रण व्यवस्था द्वितीय विश्‍व युद्ध के समय शुरू हुई. उन्होंने हमें राष्ट्रीयकरण सिंड्रोम से संक्रमित किया. ब्रिटिश खुद इससे मुक्त हो चुके हैं. अब वक्त खुद को मुक्त करने का है. क्या अगली सरकार यह कर सकती है?

Adv from Sponsors

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here