कश्मीर पर बल द्वारा नहीं,केवल पुण्य द्वारा विजय की जा सकती है ! यहाँ के निवासी केवल परलोक से भयभीत होते है,न कि शस्त्रधारियोसे !( पंडित कल्हण की राज तरंगिणी से !)

अभि अभि कश्मीर के एक मित्र का रक्षाबंधन की शुभकानाएं देनेके लिए फोन था वह रखकर ही यह पोस्ट लिखने बैठा हूँ ! लगे हाथ मैने पुछा कि कल 370 को समाप्त करने का एक साल पूरा हो रहा है आज क्या हालात हैं तो उसने जवाबमे कहा की यहा तो कर्फ्यू लगा हुआ है कदम कदम पर सेना के जवान खडे हैं !

कम आधिक प्रमाण में कश्मीर में यह नजारा 72 साल से चल रहा है ! कबायली के बन्दोबस्त के लिए भेजी गई सेना वापस आना तो दूर उल्टा सेना,सी अर पी एफ,बी एस एफ,और विभिन्न प्रकार के सुरक्षा बलों की तैनाती बढते बढते अब हर एक परिवार पर एक सेना के जवान का आनुपात हो गया है !

पिछ्ले साल आज ही के दिन 370 हटाकर राज्य का दर्जा समाप्त कर उसे केंद्र शासित प्रदेश में बदलकर रख दिया ! सामान्य रूप से केंद्र शासित प्रदेशों को राज्य का दर्जा देने की परंपरा देखी है लेकिन कश्मीर के लिए यह निर्णय ! उल्टा क्यो ?
दो दिन पहले मैंने यू ट्यूब पर शिकारा नामकी फिल्म हा फुल्प्लेज फिल्म ! लेकिन इस फिल्म में कश्मीर के इतिहास को तोडमरोडकर पेश किया है इसलिए मैं बलराज पुरी,ए जी नूरानी,ए एस दुलत,नंदीता हक्सर,सुमन्त बोस,अशोक सक्सेरिया, जवाहर कौल,शंकर सिंह इत्यादि लोगों की किताबें खंगालने के बाद यह सब लिख रहा हूँ !

इस फिल्म की शुरुआत वर्तमान प्रधानमंत्री के महिमामंडन से शूरू होकर कश्मीर के घटनाक्रमोको तोड मरोडकर रखे गए हैं ! उदाहरण के लिए आर्टिकल 370 शेख अब्दुल्ला के कहनेपर नेहरू जी ने बनाया ! इसलिये मैं पुनाह सिलसिलेवार घटना क्रम रखने की कोशिश कर रहा हूँ !

1586 में सम्राट अकबर ने मुगल साम्राज्य का हिस्सा बनाया था 1846 में गुलाब सिंह ने 75 लाख रुपये में अंग्रेजोसे खरीदा और जब भारत स्वतंत्र हो रहा था उस समय के छसौ के आस पास के देशी रियासत में से जुनागढ,हैदराबाद और कश्मीर के नवाब और राजा भारत में शामिल होने में आनाकानि कर रहे थे तो जूनागढ़ और हैदराबाद में जनता हिन्दु बहुल और नवाब साहब मुसलमान बिल्कुल इसके उल्टा जम्मू कश्मीर के लोग मेजोरिटी मुसलमान और राजा साहब हिन्दु !

हैदराबाद में पुलिस कारवाई करने के बाद वह भारत में शामिल हो गया और जूनागढ़ भी लेकिन कश्मीर के महाराजा हरिसिंह स्वतंत्र रहना चाहते थे ! हालाकि 1944 में जीना छ हप्ता श्रीनगर में तन्बू ठोककर बैठे थे लेकिन खाली हाथ लौट गये और उसी साल के अंतमे सावरकर भी गए थे लेकिन उन्हे भी कामयाबी नहीं मिली ! हरिसिंह के प्रधान-मंत्री कश्मीरी पंडित रामचंद्र काक भारत विरोधी थे और उनके बाद मेहरचंद महाजन भी उन्हिके जैसे थे और महाराजा को खुद को भी भारत में शामिल होने में रुचि नहीं थी !
1846 में अंग्रेजोसे 75 लाख रुपये में खरीदनेके बाद 1947 याने 101 सालो में 80 %मुसलमान आबादी वाले कश्मीर के 28 दिवान डोगरा महाराजा ने एक भी मुसलमान या गैर डोगरा दिवान नियुक्त नहीं किया था वही हाल अन्य सरकारी महकमों में भी था !

कश्मीर में इस्लाम बादशाहो के द्वारा नहीं फैला 12 वी सदी में सूफी संतों के कारण और वह भी जाति व्यवस्था के कारण फैला है हालाकि यह बात पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के इस्लामी करण को लागू हैं ! उसका सबसे ताजा उदाहरण डॉ बाबा साहब आंम्बेडकरजी के येवला की सभा में 1936 में की गई घोषणा की मैं हिन्दु के रूप में पैदा जरुर हुआ हूँ लेकिन मैं हिन्दु के रूप में मरूँगा नहीं ! और 20 साल बाद उन्होंने अपने लाखो अनुयाइयों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली है ! इसका कारण क्या है ?
कश्मीर की समस्या को बढ़ाने के लिए वहाके हिन्दु महाराजा मुख्य रूप से जिम्मेदार है और जब जीना ने कहा की अगर कश्मीर पकिस्तान में शामिल हुआ तो पकिस्तान कश्मीर की स्वायत्तता में हस्तक्षेप नहीं करेगा 14 अगस्त 1947 को यथास्थिति (standstill)का समझौता किया है ! और मजेदार बात महाराजा ऐसाही समझौता भारत के साथ करना चाहते थे लेकिन भारत ने कहा कि जनताकि इच्छा के अनुसार काम करंगे और यही बुनियादी फर्क है कि मुस्लीम लीग महाराजा को झूठे आश्वासन देकर फुसला रही थी और उधर कबायली के नाम पर सेना की तरफ से आक्रमण करने की तैयारी जारी थी !15 अगस्त 47 से 27 अक्तूबर 47 तक दो महीने से ज्यादा समय कश्मीर के महाराजा के कारण पकिस्तान को मुजफ्फराबाद की तरफ से कबायली के नाम पर सेना की तरफ से आक्रमण करने का मौका मिला है और आजका पी ओ के लगभग 84000 स्क़ेअर की मी कश्मीर का हिस्सा हथियालिया है ! जिसे अब पकिस्तान आझाद कश्मिर बोलता है और भारत पी ओ के याने पाक आक्युपाई कश्मीर !
80 प्रतिशत आबादी मुसलमान होने के बावजूद कश्मीर में सांप्रदायीक राजनीति देश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बिल्कुल नहीं थी हालाकि प्रजा परिषद के नाम से संघ परिवार के लोग जिन्हे राजा की शह थी और मुस्लीम लीग के नाम से छ सप्ताह कश्मीर में जिनाने खुद कोशिश करने के बावजूद दाल नहीं गली तो उन्होने भी मुस्लीम कॉन्फ्रेस के नाम से और सबसे संगिन बात यह दोनो धड़े राजा के समर्थक थे ! याने अंग्रेजोकी बाटो और राज करो की नीति राजा साहब भी बखूबी चला रहे थे ! लेकिन इन दोनों को अपेक्षाकृत कामयाबी नेशनल कॉन्फ्रेस की तुलनामे कोई खास नहीं मिली ! और यही कश्मीरीयत है भारतीय उपमहाद्वीप के इस्लामी पहचान को देखकर लगता नहीं कि कश्मीर में उस तुलनामे फर्क है !

1990 में जगमोहन नामके राज्यपाल थे उन्होने खुद सेना के ट्रक लेजाकर कश्मीरी पंडितों को कहा कि कुछ समय के लिए आप लोगों को मै सुरक्षात्मक उपाय के लिए कही और लेजा रहा हूँ और बादमे वापस लाकर छोड़ूंगा लेकिन यह बाद अबतक नहीं आया कलही पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला ने 90के कश्मीरी पंडितों के विस्थापन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के कोई इन्टीग्रेटेड रिटायर जज द्वारा जांच की मांग की है ! क्यौंकि भारत के इतिहास में जगमोहन पहले राज्यपाल होंगे जिसे तुरंत वापस बुलाया गया है ! और मैने मॉडरेट हुरियत के नेताओं से इस बारे में 5-6 घंटा बात की हैं और उन्होने साफ शब्दों में कहा कि कश्मीरी पंडितों के बगैर कश्मीरीयत बेमानी है और जगमोहन को जिम्मेदार ठहराया और मुझे अशवस्त किया की आपको अगली कश्मिर यात्रा पर यहाँ पंडित अपने अपने पुस्तैनी घरोमे मिलेंगे यह 2006 की बात है !

2016 में दोबारा मै गया और सबसे पहले जाग्रति नामके जम्मू से 15 किलोमीटर की दूरी पर जो कश्मीरी पंडितों के केम्प में गया तो पण्डितोके नेता त्रिलोकिनथ पंडित घर पर काफी समय बैठे थे वह केम्प डॉ मनमोहन सिंह के करकमलों से उद्घाटित हुआ था जिसका फोटो त्रिलोकनाथजिकी दिवारपर टंगा था! तो उनके घर में उनके अलावा कोई नहीं था तो सामनेवाले फ्लेट की तरफ देखा कर आवाज दी की अंजली जरा दो तीन कप चाय देना ! कुछ समय के बाद एक 30-35साल की महिला हाथमे ट्रे लेकर आई और मेरेही बगलमे बैठते हुए बोली की आप डॉ सुरेश खैरनार है और 2006 में भी आप हमारे पहले वाले टिन के केम्प में आये थे और वापस वैली में चलने की बात कर रहे थे और अब तो आप देख रहे हैं भारत सरकार ने कितने अच्छे-खासे मकान बनाकर दिये हैं ! हम मुस्लमानोको म्लेच्छ (अछुत) मानते हैं और हम उनके लिये अलग बर्तन रखते हैं और हम यहा पर खुश हैं हमे नहीं आना वैलिफैलीमे उल्टा अगली बार जब आप आओगे तो आपको यहा नहीं मिलेंगे मेरी बेटी पुनेमे आय टी सेक्टर में काम करती है और मै भी पुणे शिफ्ट हो रही हूँ ! हम पंडित पढने लिखनेवाले लोग है हमारे काफी लोग विदेशो मे बस गये और बचे खुचे पुणे,बंगलोर,हैदराबाद,चेन्नई,दिल्ली,कोलकाता जैसे महानगरोमे बस गये हमे नहीं रहना मुसलमानो के साथ ! और यह बात सिर्फ अंजली रैना की नही कम अधिक प्रमाणमे काफी कश्मीरी पंडितों के जेहन में है ! इसीलिए कई लोगों को लगता है कि हम सिर्फ मुसलमानोकी बात करते है ! तो मै इतने सालोमे जब जब कश्मिर गया हूँ कश्मीरी पंडितों को मिले बगैर नहीं लौटा हूँ ! हालाँकि मैं तो गाव,देहात सुदूर पहाडो पर और बारह महीने सतत अपनी भेड बकरियां लेकर चलने वाले बकरवाल,गुज्जर जैसी जनजतियोके साथ भी काफी समय रहा हूँ !

वहां के रीति रिवाजों को देखकर लगता नहीं कि कौन हिन्दु हैं और कौन मुसलमान वहाके नाम ही देख लीजिये ऋषी परवेज,मौहम्मद पंडित,जफर भट, ! और यह नाम मै मेरे दोस्त लोगों के दे रहा हूँ इसके अलावा दर्जनो उदाहरण है !
अडवाणी जी ने कुछ 300 से ज्यादा मंदिर कश्मीर में तोड़े गए ऐसा आरोप किया था तो इंडिया टुडे पत्रिका ने बाकायदा सर्वेक्षण किया और छपा है की इस तरह के एक भी मंदिर की तोडनेकी घटना नहीं मिली ! मैं खुद 2016 के अक्तूबर में बुरहान वानी की हत्या के बाद दो हप्ते भर कश्मीर में परिस्तिथि का आकलन करने के लिए घूम रहा था तो बडगाव नामके गावं में सबेरे के समय कुछ भजन,कीर्तन कानपर आये तो जिनके पास ठहरा था ऊन की पत्नी को पुछा कि आपके गाव में कितने हिन्दु घर है तो वह बोली पाँच घर है लेकिन सभी बंद है और क्यो चले गये पता नहीं वो हमारे रिस्तेदार जैसे ही थे ! तो मैंने पूछा कि यह भजनों की आवाज कहासे आ रही है तो उन्होने कहा की हमारे गाँव में दुर्गादेवी का मंदिर है और अभि नवरात्र का समय है तो वहा जगृता चल रही है ! मै दंग रह गया कि एक भी हिन्दु गाव में है नहीं है और यह क्या माजरा है ? तो मैंने पूछा कहाँ पर मंदिर है तो उन्होने गावके बाहर एक छोटा टीले पर है करके कहा तो मै शामको उनके पतिके साथ मंदिर में गया तो मंदिर परिसर बहुत ही साफ सुथरा और मंदिर में दिया जल रहा था लेकिन पुजारी कही दिख नहीं रहा था कोई सेवादार जैसा साफ सफाई करने वाले को नाम पुछा तो याकुब ! पंडित जी कहा हैं? तो बोला बगल के गाँव में पूजा करने गये हैं मैने उसे पंडित जी का मोबाइल नंबर पुछा तो उसने बताया और मैने पंडित जी से बात की पहले पुछा कि आप कहाँ पर है और यहा कब तक पाहूचनेकी संभावना है तो उन्होने बताया कि वे आज जागरण करने के लिए उसी गाँव में रहेंगे फिर मैने पूछा कि आपकों अकेले यहाँ पर डर नहीं लगता तो उन्होने बताया कि आप यह सब क्या पुछ रहे हो ? हम बिल्कुल ठीक है और पूरे गाववाले हमारा ख्याल रखते हैं !

इसीतरह श्रीनगर के डाऊन टाऊन एरिया में एक मंदिर वॉर्ड है मै वहा भी गया एक रिटायर प्रो दार हिन्दु पंडित जी के घर पर एक घंटे से ज्यादा समय रुका और काफी बातचीत की उनको एक बेटी है जो कॉलेज में पढ रही है ! मैने उसे भी पुछा कि बेटा आपको यहा कोई तकलिफ या डर तो उसने बताया कि बिल्कुल भी नहीं उल्टा जब भी कभी बवाल होता है तो सभी मोहल्ले वाले हमारी मदद करने के लिए आधी रात को आ जाते है !

कश्मीर की फिजा बहुत ही अलग है जहा पर सांप्रदायिकता की बात दूर दूर तक नजर नहीं आती है ! जो कुछ लढाई चल रही है वह कश्मीरीयत की है ! जैसे आसाम आन्दोलन की बात है आसामीयत की बात है ! पिछ्ले सितंबर में मै 25 दिन आसाम में घूमकर यह लिख रहा हूँ !

जब हम बंगाल,आसाम,महाराष्ट्र,गुजरात,कर्नाटक,आंध्र,तमिलनाडु,ओरिसा,पंजाब,राजस्थान के प्रश्न समझ सकते है तो क्यो कश्मीर को नहीं समझते उसे एक कोढ़ी के जैसा बनाकर रख दिया है ! क्यौंकि 80 प्रतिशत आबादी मुसलमान है इसलिये ? फिर भारत की मुख्य धारा में लाने के लिए बन्दूक,बख्तरबंद गाडिया,टैंक,और हर एक परिवार पर एक सिक्यूरिटी का जवान वह भी हाथमे एके 47या 56लेकर ! हमारी आजादिको आनेवाले 15 अगस्त को 73 साल पूरे हो रहे हैं ! मैने आसाम,मणिपुर,नगालैंड,त्रिपुरा,मेघालय,अरुणा चल और सबसे हैरानी की बात मध्य भारत के छत्तीसगढ,झारखंड,ओरिसा के कुछ हिस्से,महाराष्ट्र के गढ़चिरौली,चन्द्रपुर,भण्डारा,गोंदिया,यवतमाल जिले,तेलंगाना के क्षेत्र को मिला कर मोटा मोटी भारत का एक चौथाई आबादी के लिए कश्मीर जैसे हालात बने हुए हैं कारण भले अलग अलग है पर उपाय सुरक्षा बलों की तैनाती यह आजादीके 73 साल की उप्लब्धता है ? शायद ही दुनियाके किसी इतने बड़े स्तर पर सेना तैनात करने का यह अकेला उदाहरण होगा यह सभी प्रदेशोमे कश्मिर जैसे हालतों को मै देखकर यह सब लिख रहा हूँ ! भले कोई नक्सली समस्या है और कोई पहचान की तलाश कर रहे हैं तो कोई अपने भाषा,संस्कृतिक आक्रमणों की बात कर रहे हैं और करे तो क्यो ना करे क्योकिं आजादीके बाद सभीको अपने अधिकार अपने सम्मान और सबसे बड़ी बात जीने का अधिकार !

जब तक लोगों के सवालों को ठीकसे समझकर सुलझानेकी कोशिश नहीं कि जाती तब तक यह असंतोष बकरार रहेगा और सुरक्षा बलों की तैनाती यह कोई उपाय नहीं है !

डॉ सुरेश खैरनार 5 अगस्त 2020,नागपुर

Adv from Sponsors