“थोड़ा सा जीने की ख़ातिर भी
यहाँ कितना सारा मरना होता है..
कभी पूरा पन्ना कोरा रह जाता
कभी अक्षर-अक्षर जलना होता है”

देखो न सब अपने रास्ते जा रहे हैं। लेकिन, इन सबके बीच कोई है जो सड़क किनारे बैठा हर उस गाड़ी को बड़ी सिद्दत से देख रहा है जो पूरब की ओर जा रही है। मेरे लिए पूरब का मतलब सूरज निकलने की दिशा नहीं बल्कि तेरे गाँव का पता है। गाँव से याद आया वो गंगाजी के घाट पर जब मैं तुम्हें छुप कर नहाते हुए देखता तो उस एक पल मेरा मन गंगा हो जाने को करता। आज सड़क तक पार करने का मन नहीं।

जानती हो सड़क के इस पार ही एक पॉपकॉर्न वाला भी है। पॉपकॉर्न की खुशबू के साथ ही तुम्हारी याद और भी बढ़ती जाती है! कि कितनी ही फ़िल्में हमने साथ में देखी हैं, कि कितनी ही बार इंटरवल में हमने पॉपकॉर्न खाये हैं। आज भी यही लगा कि अभी हमारे जीवन का इंटरवल हुआ है। आज भले दूर-दूर ही सही लेकिन, फ़िल्म के आख़िर में हम जरूर मिलेंगे! आमीन।

(एक प्रेमी की डायरी से कुछ पन्ने चुनकर हम आपके लिए लाते रहेंगे)

हीरेंद्र झा (लेखक/पत्रकार)

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