आँखें मूँदे सोच रहे हैं
क्या हम तुमको भूल चुके हैं

मैं मेरी सच्चाई और वो
तीनों तीन जगह रहते हैं

सब कुछ अच्छा हो जाएगा
सच, हम भी कितने झूठे हैं

आधा हूँ मैं आधी हो तुम
आओ मिलकर कुछ बनते हैं

हैं कुछ छोटे छोटे से दुख
जो मुझसे हक़ माँग रहे हैं

किसने हाल हमारा पूछा
सारे आँसू बोल पड़े हैं

बाहर, बाहर वाले जानें
अंदर हम टुकड़े टुकड़े हैं

इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’

(यह ग़ज़ल उनकी चर्चित पुस्तक ‘दूसरा इश्क़’ से ली गयी है। साभार: राजपाल प्रकाशन)

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