डॉ राहुल रंजन

एक शाम मुल्ला नसरूद्दीन बगदाद के बाहर बैठा आसमान को निहार रहा था, ठंडी हवा चल रही थी मौसम सुहाना था इतने में जोर का अंधड आता हुआ दिखाई दिया जैसे ही वह करीब आया मुल्ला जोर से चीखा- बोला मुझे जानता नहीं मेरी आज्ञा के बिना शहर में प्रवेश नहीं कर सकता – अंधड ने कहा क्षमा करें मैने नहीं पहचाना आप कौन- मुल्ला बोला मै खलीफा हूं तुम कौन- उधर से जवाब आया – मै मौत हूं और मुझे बगदाद में सौ लोगों को मारना है मै रूक नहीं सकती आज्ञा है, ठीक है जाओ पर वादा करो सौ ही मरोगे उसने कहा वादा किया, मै तुम्हारे लौटने का इंतजार करता हूं, अंधड तेजी के साथ बगदाद में प्रवेश कर गया महामारी फैली और हजार लोग मारे गए, मुल्ला गुस्से में तमतमाया उसके बाहर निकलने का इंतजार करता रहा जैसे ही अंधड बाहर आया मुल्ला बोला- रूक मौत होकर तूने झूठ बोलना कैसे सीखा तूने तो वादा किया था सौ मारने हैं पर यहां तो हजार मर गए, मौत बोली- माफ करें मैने तो सौ ही मारे हैं बाकी को तो मैने छुआ तक नहीं वे तो दहशत में ही मर गए और मौत तेजी से बाहर निकल गई|

 हालात और दृष्य इन दिनो कुछ ऐसे ही दिखाई दे रहे हैं जिनकी मौत तय है उन्हें कोई बचा नहीं सकता लेकिन जिन लोगों ने मौत को अपने घरों में पनाह दी है उनका कुछ किया नहीं जा सकता| देश के खलीफा के पास जितनी ताकत थी उसने लगा दी उसने समझाया भी कि मौत को अपना घर मत दिखाओ लेकिन धर्म के ठेकेदारों की हिमाकत तो इतनी बढ गई कि उन्होंने मौत को कैद करने की पुरजोर कोषिश की और मौत अपने बंदी बनाए जाने पर बिफर पडी नतीजा सामने है पूरे देश में मौत उन लोगों की पीठ पर सवार होकर नरसंहार करने निकल पडी जो उसे अपना दास बनाने पर आतुर थे| हुक्मरान भी इनके सामने बौने साबित हो गए| जब तक मौत के इस अंधड को बाहर निकलने का रास्ता तलाश किया गया तब तक तो मौत कई घरों में बंद दरवाजों के पीछे कोठरियों में कैद कर ली गई  इन कोठरियों को खोलने का जब जतन किया गया तो मौत ने तांडव कर दिया| सच है कि उसकी संख्या में कोई झोल नहीं था वह तो वादे की पक्की थी लेकिन हमने ही उसे झूठ बोलने पर मजबूर कर दिया| महीने भर से चुपचाप अपने घरों में दहशत के माहौल में जी रहे हैं दरवाजे पर हर ठक-ठक पर मन घबरा उठता है| मातम पर भी बोल नहीं फूट रहे पर सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है जो बेचारे मौत के इस तांडव की फिक्र किए बिना ही अपने वतन के लिए निकल पडे, जुगाड तो जुगाड पैदल ही- उनमें कितनो का सफर घर की देहरी पर खत्म होगा कोई कह नहीं सकता क्योंकि मौत तो खुले  आम विचरण कर रही है| मौत तो वैसे भी आनी है क्योंकि कोरोना के इस लाक डाउन ने कई जिन्दगियों को उनके अंतिम पडाव के दिव्य दर्षन करा दिए| मौत ने सही कहा था उसे जितने मारने है उतने ही वह मारेगी पर उसके बाद जिस दहशत का उसने जिक्र किया था वह तो लाकडाउन के बाद दिखाई देगी| जब देश में भुखमरी का ऐसा आतंक उठेगा जिसे संभाल पाना न हुक्मरानों के मुट्ठी में होगा और न ही नौकरशाहों के और न ही इस देश के उद्योगपतियों के,जीवन को तो किसी तरह हाथ धोकर, मास्क लगाकर और घरों में कैद करके बचा लेने में सफल हो जायेंगे पर इसके बाद देश का मंजर कुछ ऐसा होगा जैसा बाढ का पानी उतर जाने के बाद खाली पडी जमीन पर तबाही के अवशेष दिखाई देते हैं, पर्दे के पीछे अभी से खेल शुरू हो चुका है मानवता और संवेदनाओं का गला घोटा जाने लगा है इन खेलों को उजागर होने में अभी समय का इंतजार करना मजबूरी है पर कोरोना- कोई नहीं रोना का संदेश आने वाले दिनों का स्लोगन होगा| खैर अभी तो पुलिस का डंडा और डाक्टरों की कर्तव्यनिष्ठा और सरकार की तत्परता से मौत निकल भागने का रास्ता खोज रही है लोगों को शांत और धेर्य  बनाये रखने का उपदेश दिया जा रहा है जिससे कि मौत को सुकून से देश से बाहर निकल जाने का मार्ग मिल सके पर इस दौर में विचलित करने वाले दृष्य भी सामने आए जिनको देखकर हुक्मरानों की दोगुली सोच उजागर हो गई है|

 देश के मुखिया लोगों को मौत से बचाने के लिए जुटे रहे और देश वासियों को भविष्य की चिंता की परवाह कर विकास की धुरी पर बैठे तमाम उद्योगपतियों, सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं, वित्तीय और बैंकिंग संस्थानों से हाथ फैलाकर राहत की गुहार लगाते रहे पर उनकी बात न कोई सुन रहा है और न ही ऐसा करते कोई दिखाई दे रहा है; वित्तीय संस्थानों को तो इन दिनों कफन का भी पैसा वसूल करने की चिंता सता रही है| लाखों मजदूरों और दिहाडी करने वालों की मौत के फरमान निकलने लगे है| आने वाले दिनों में मौत को कोरोना का बहाना नही बनाना होगा वह इस देष में कई रूपों में दिखाई देगी और हुक्मरान इस मौत के तांडव को भी भुनाने में लग जायेगें| मानवता जैसे निरीह शब्दों का वजूद ही नही रहेगा क्योंकि सरकार ने लोगों को घरों में रहने और बाहर न निकलने का हुक्म दे रखा है इसके अलावा जिन मोर्चो पर काम हो रहा है वह सब कोरोना के वर्तमान डर को लेकर है आने वाले दिनों की भयावह आहट से हुक्मरान अनभिज्ञ नहीं है पर उस पर चुप्पी बनी हुई है| लेकिन इस मुष्किल दौर में जो डटे हुए हैं वह सही मायने में मौत के सामने खडे होकर उसे पीछे धकेल रहे हैं यही हैं असली यो़द्धा जिन्होंने भारत की जमीन कोरोना को परास्त करने में अपना परिचय मौत को दे दिया है|