सचिन नाथ

कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन के बाद अब लोगों का पलायन सरकार के निर्णय पर कई सवाल खड़े कर रहा है। आखिर जेठ की भरी तपन में देश के राजमार्गों पर उमड़ा मजदूरों का जनसैलाब और उनके पांव के छाले देखकर अब तो राजनेताओं को शर्म आना चाहिए पर अफसोस ऐसे समय में भी यह लोग राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं और एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। जितनी मौतें देश में कोरोना से नहीं हुई है उससे कहीं ज्यादा भूख और हादसों से हो रही हंै, आखिर इसका जवाबदार कौन है ? आजादी के बाद देश के विभाजन के समय जैसी स्थिति वर्तमान में दिखाई दे रही है। हम इतने सालों में इन्हीं मजदूरों के विकास को लेकर बड़ी-बड़ी बातें सुनते आ रहे हैं, लेकिन यह हकीकत है कि कोरोना ने देश की वास्तविक स्थिति से सभी को अवगत करा दिया, क्योंकि मजदूरों की इस हालत के लिए सभी दोषी हैं। मीलों के सफर में कुछ लोग आधे रास्ते में ही दम तोड़ रहे हैं, जो जिंदा तो नहीं लेकिन मरने के बाद अपने ठिकाने पर पहुंच रहे हैं। ऐसे लोगों की हाय से बचना नामुमकिन है। कुछ लोगों के अंदर मानवता जागी है जो ऐसे मजदूरों की मदद करने आगे भी आ रहे हैं। पर अफसोस है राजनीति से जुड़े कुछ समझदार इन्हीं मजदूरों की गलती बता रहे हैं। यह लोग घरों से बाहर क्यों निकल रहे हैं, जब इन्हें गांव जाना ही है तो शहर आते क्यों हैं। सरकार ने सभी के लिए बंदोबस्त कर दिया है। यह बातें वही लोग कह रहे हैं जो राजनीति की चकाचौंध में अंधे हो गए हैं। इन मजदूरों के साथ कई ऐसे आम नागरिक भी हंै जिन की पीड़ा अभी किसी को दिखाई नहीं दे रही है, लेकिन उन लोगों की पीड़ा भी मजदूरों से कम नहीं, क्योंकि यह वही लोग हैं जिनके न तो राशन कार्ड हैं न ही किसी प्रकार की सरकारी मदद मिलती है। ऐसे लोग हमारे आसपास बहुत सारे हैं जो प्राइवेट नौकरियां करते हैं। छोटा-मोटा व्यापार करते हैं जिनकी आय भी 10 से 15000 के बीच ही रहती है। आज ऐसे लोगों के लिए भी परिस्थितियां विषम हो गई है । एक ओर जहां घर का राशन समाप्त हो गया है तो वहीं दूसरी ओर रोजगार और नौकरियों पर तलवार लटकी नजर आ रही है । आखिर ऐसे लोगों की मदद कौन करेगा। ऐसे में सरकार आर्थिक पैकेज का ऐलान कर अपने मुंह मियां मि_ू बन रही है तो वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने पर आमदा होकर सरकार को घेरने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ रहा है। पर यह जनता सब जान गई और अपने ऊपर लगा राजनीतिक चश्मा उतार कर लोगों की सेवा कर रही है। बिना सरकारी सहायता के घर चलाने वाला आम आदमी अपनी इमेज के चलते न तो राशन की लाइन में लगता है न ही किसी को एहसास होने देता है। मेरा हाल क्या है, मकान की कि़स्त, झूठे रहन-सहन का दिखावा, बच्चों की फीस देकर अंदर ही अंदर घुट रहा है। जिसके बारे में किसी को भी सोचने का समय नहीं वही आम आदमी आज सबसे ज्यादा परेशान है। सरकार किसी भी दल की क्यों न हो वह सिर्फ वोट बैंक के बारे में ही सोचती है। कहीं ऐसा न हो जाए कि लोग ऐसे नेताओं का ही बहिष्कार करने सड़क पर उतर जाए पर राजनीति के इन जादूगरों के पास बंदर को नचाने की कला में महारत हासिल है, क्योंकि जैसे ही चुनाव आएंगे फिर जनता को सपना दिखाया जाएगा। लोग इनकी बातों में आसानी से फंस जाएंगे। धर्म, जात-पात के नाम पर लोगों से फिर वोट लेकर सत्ता पर राज किया जाएगा। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खुला खेल खेला जाएगा। जनता को इसी तरह बेवकूफ बनाया जाता रहा है, पर यह सच है कि हमाम में सभी नंगे हैं। जनता को छलने का यह खेल बहुत पहले से खेला जा रहा है। विकास के नाम की राजनीति में खुद का विकास किया जा रहा है। यह खेल कब तक चलेगा यह तो वक्त ही बताएगा, पर इतना जरूर है कि एक दिन ऐंसा जरूर आएगा देश के नौजवान इस चीज को समझने लगे हैं। लोकतंत्र में ईमानदार और कर्मठ लोगों की महती आवश्यकता है, नहीं तो लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठ जाएगा। वर्तमान समय में राजनेताओं ने ऐसी मिसाल पेश की है जो लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। 2 किलो आटा बांट कर और मजदूरों को चप्पल पहना कर राजनेता अपनी उंगली कटा कर शहीदों की लिस्ट में शामिल होना चाहते हैं, ऐसे नेताओं से यही कहना है कि बेशर्मो अब तो शर्म करो और बंद करो ऐसी राजनीति और उखाड़ फेंको भ्रष्टाचारी दिमाग को जिसने पूरे तंत्र को खोखला कर दिया है, नहीं तो एक दिन जनता तुम्हें उखाड़ फेंकेगी।