आज पिता दिवस पर प्रस्तुत है चर्चित युवा कवि ब्रज श्रीवास्तव का उनके कवि पिता घनश्याम मुरारी पुष्प पर एक संस्मरण।श्री पुष्प के दो कविता संग्रह और पंचतंत्र का काव्यानुवाद प्रकाशित हुए हैं। उनकी एक बाल कविता बने जो बच्चों की सरकार मध्य प्रदेश के पाठ्यम में कक्षा तीन में सम्मिलित है।-संपादक

|| संस्मरण ||

पिता के साये में जीवन

–ब्रज श्रीवास्तव

‘’सीताराम तो कहो रे ..रे मनवा ‘’ …होश सँभालने के बाद की बात है ..गांव में अपने पड़ोस वाले घर में उस रात गम्मत हो रही थी ,मैं अपने कुछ चपल बाल मित्रों के साथ वहां पहुंचा तो देखा कि मेरे पिताजी हारमोनियम बजाते हुए,उक्त पंक्ति को गा रहे थे,,सभी उनके अलाप का इंतजार कर रहे थे| और जब उन्होंने ऊँचे सुर में आलाप लिया तो मौजूद रसिक गण लग वाह वाह करने.|
गांव मेरे लिये हमेशा एक रुमान रहा आया.यह एक ऐसा ठांव है जहाँ बुंदेलखंड और मालवा के छोर मिलते हैं.,वहां की बोली सुनकर कोई भाषा का जानकार भी उलझ सकता है कि इस बोली को क्या नाम दिया जाये..जिसमे बुन्देली,मालवी,में थोड़ी सी मुरैन्वी भी घुली हो,|पिताजी अलबत्ता खड़ी बोली भी बोल सकते थे|
हमारा कच्चा घर था लेकिन दुमंजिला|अटारी वाला घर|बचपन में जब सीढ़ी चढ़ते तो वहीँ से आवाज़ देते की हम आ गए खेल कूद कर,, ताकि दादी या माँ हमें पानी के छीटों से पवित्र करदें| जैसे गैर जाति के बच्चों के साथ खेलने से हम सच में अपवित्र हो गए हों|
पिताजी की उस वक्त की सूरतो शकल याद करूँ तो याद आता है की वो एक सुंदर युवक थे,और उनकी आँखों में आकांक्षाएं और जिज्ञासाएं चमकती थीं,गोल चेहरा,नुकीली नाक,चौड़ा माथा और फुग्गा रचने योग्य काले चमकीले बाल|गांव में सर्वाधिक शिक्षित वो ही थे..|
गांव की मुख्य सीमा तो एक नदी से खिंची है, जो बड़ा आश्रय थी उन दिनों |किसी भी वक्त जाने पर वहां दस बीस लोग नहाते- धोते मिल ही जाते|कैसी लहराती हुई बहती थी वो नदिया, जो आगे जाकर बीना नदी में समां जाती|उस नदी में ही पिता के हाथों के सहारे ने मुझे तैरना सिखाया.|जाने कब वो दिन आगये, जब मैं उनकी अंगुली छोड़ खुद ही उसकी गोद में खेलने के लिये जाने लग गया था | वो पग डंडियाँ, और ,चारों ओर खड़े महुआ,पीपल ,बरगद ,आम,खजूर ,कबीट के पेड़ जैसे संकल्प लिये थे छाया देने को.|चना,गेहूं मसूर के लिये उपयुक्त काली मिटटी इस आँचल की पहचान थी;;अपनेपन से बोलते,बदन पर आधी धोती लपेटे, वो मजदूर नुमा लोग ही थे जो गांव को सच्चे मायनों में गांव बनाये रखते थे. बरसात में खपरों को वाद्ययंत्र मानकर जब पानी की बूंदें अपना पतन राग छेड़तीं तो हम बच्चो को बहुत मज़ा आता.बाहर चबूतरों पर चौपड़ का टूर्नामेंट चलता रहता.तो कभी आल्हा का समवेत स्वर में गायन.चिमनी और लालटेन की दीपशिखा इतने विशाल अंधियारे से भिडंत कर लेती.दूसरी ऋतुओं में भी अपनी तरह के कुछ ना कुछ कौतुक होते ही रहते थे..||
पिताजी भी अक्सर चबूतरों पर अपना कुलीन बोध छोड़कर बैठ जाते..अपने निरक्षर सखाओं के साथ वह ताश खेलते,गपशप करते, लोकगीत गाते,तफरीह को जाते.और हाट- बाज़ार को भी जाते.हर गांव में एक मन्दिर होता है सो वहां भी था.जहाँ कीर्तन होती,पिताजी उसमे शामिल ना होते,उन्हें ऐसा शगल उबाऊ लगता था.हाँ हम बच्चे ज़रूर प्रसाद पाने और मौज मस्ती करने के लिये पिताजी की नज़रों से बचकर जाया करते…मुझे तो इसके लिये पिताजी की कई बार फटकार खाना पड़ी थी. पिताजी वैसे वाले भक्त नहीं थे. जब और लोग भजन कीर्तन करते,पिताजी चिमनी के मद्धिम प्रकाश में पढने के लिये बैठे होते.वह उस दुनिया में रहते हुए साहित्य से, ना जाने कैसे जुड़ गए थे कि धर्मयुग,साप्ताहिक हिंदुस्तान,मायापुरी आदि के अंक नियमित रूप से डाकिया दे जाया करता था.शरतचंद्र के उपन्यासों के अलावा उनकी अलमारी में रानू,वेदप्रकाश शर्मा,जैसे लेखकों की किताबें भी हुआ करती थीं.इतनी अभिरुचियों के साथ ही कदाचित वो इतनी अच्छी जिन्दगी जी पाते थे.वैसे बढ़िया जीवन कहाँ था उनका.?दादाजी के बड़े पुत्र होने के कारण जहाँ पारिवारिक जिम्मेदारियों के लिये एक मर्यादित और अनुशासित जीवन जीने की अनिवार्यता थी, वहीँ हम ६ भाई बहिनों के पालन पोषण की जिम्मेदारी भी उन्हें चुनौती देने के लिये काफ़ी थी.
उनका नाम घनश्याम मुरारी श्रीवास्तव था,,बाद में उन्होंने उपनाम के स्थान पर लेखकीय उपनाम ‘पुष्प’ लिखना शुरू कर दिया था.दादी कहतीं थी कि वे रामनवमी को जन्मे थे.१९४२ में.शायद इसी वजह से उनका राम के मिथकीय चरित्र से बड़ा लगाव था.और वह रामचरित मानस का खूब पाठ करते थे.पाठ भी केवल पाठ ना होता था.अर्थ खुद ही समझना..और उसमे छिपी कविता का रस लेना उन्हें दिलचस्प लगता था,तुलसी जयंती के पहले ही वह मुझसे पूछते..”स्कूल में तुम नहीं भाग लोगे तुलसी जयंती पर.?’’और वह खुद लिखकर देते एक तहरीर.अक्सर मैं ही प्रथम पुरस्कार पाता.
मेरे गांव का नाम कांकर है जो कुरवाई के पास है और विदिशा से लगभग ८० की.मी. की दुरी पर है|गांव के उसी स्कूल में मैं पहले दुसरे दर्जे में पढ़ा हूँ जिसमे पिताजी ही शिक्षक थे.उसी वक्फे का एक प्रसंग मुझे खूब याद है.दरअसल पिताजी ने कुछ युवकों को जोड़कर नाटक खेलना शुरू किया था.बाकायदा मंच होता था..मुखौटे,,अनुरूप पोशाखें और लटकने वाला माइक होता था.पिताजी राजा हरिश्चंद्र के किरदार का निर्बहन कर रहे थे.अंतिम द्रश्य में वह काफ़ी तकलीफों से गुजर रहे थे..और लगभग विलाप कर रहे थे,दर्शक दीर्घा में बैठा मैं सिसकते हुए रोने भी लगा.जब मुझे रोका गया तो मैं बिलख बिलख कर कहने लगा..पिताजी को यहाँ बुलाओ मैं उन्हें घर ले जाऊंगा..द्रश्यांतर के बाद वह आए और बोले..”बेटे.. ये तो नाटक है देखो मैं तो खुश हूँ.”तब जाकर मुझे राहत हुई.लेकिन उनके अभिनय की कला को अब तक ना भूल पाया हूँ मैं.
पिताजी कवि हैं ये भी मुझे बचपन में ही मालूम हो गया था.उनकी कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी से हुआ करता और चबूतरों पर बैठकर लोग उनकी तारीफ करते और गौरव करते की हमारे गांव का नाम हो रहा है| बाद में माध्यमिक की पढाई के लिये मुझे अपने मामा के कसबे अशोकनगर(जिला गुना म.प्र.) भेजा गया था. एक बार पिताजी जब अशोकनगर आए तो गिरिजाकुमार माथुर से मिलने मैं भी उनके साथ गया था.मुझे याद है उनके बीच एक लम्बी चर्चा हुई थी..काश मैं ध्यान से सुन सका होता..कितनी महत्वपूर्ण बातें हुईं होगीं वहां||.
समय की रेल चलती ही रहती है.हम उसमे सवार ना भी हों तो भी वह हमें ढोती है..बाज़वक़्त हम अपने गंतव्य को समझ उसकी सवारी करते हैं ..ऐसा ही कुछ हुआ की पिताजी को प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने की धुन सवार हो गयी..इसके पहले वह बी.ए में भोपाल विश्वविद्यालय में मेरिट में आने के कारण आत्मविश्वास से भरे थे.दो..बार पी.एस .सी में लिखित परीक्षा में भी पास हुए..और फिर वह १९८० में एक छोटी सी प्रशाशनिक अधिकारी की नौकरी पाने में कामयाब होकर, बस्तर जैसी दुर्गम जमीन पर ज्वाइन करने चले गए.पहली बार जब वहां से आए तो कितने संतुष्ट थे,हाथ में सुंदर ब्रीफकेस और एक अन्य बैग में उपहारनुमा कई वस्तुएं.|तब वे ४०-४२ साल के थे.मैं अक्सर अपनी आयु का ख्याल करते समय, उनकी इस आयु में अर्जित की गयीं उपलब्धियां और संघर्ष की कल्पना करता हूं तो चौंक जाता हूँ कि मेरी चाल कितनी मंथर है और वे कितने द्रुत रहे आए.उनकी इस नौकरी के चलते हमें मध्यप्रदेश के कस्बों शाहनगर ,अजयगढ़,निवाड़ी,,पृथ्वीपुर,पन्ना,कटनी,में रहने का मौका मिला.अजयगढ़,में पिताजी प्रसिद्ध लेखक अम्बिका प्रसाद दिव्य,के संपर्क में रहे.समीप में ही बांदा था जहाँ कवि केदारनाथ अग्रवाल रहते थे. एक बार उनसे मुलाकात करने के लिये भी वह बाँदा गए थे.
पिताजी प्रशासनिक अधिकारी तो हो गए थे,लेकिन अक्सर ही असहज रहते.कारण होतीं उनकी स्पष्ट सोच और वैसी ही बातचीत .जबकि राजनीतिक लोग ग़लत करवाने का दबाव डालते रहते.इसी वजह से उनको तबादलों की परेशानी भी झेलना पड़ीं. नौकरी के कुछ सालों पहले उन्का तबादला कुरवाई ( विदिशा) के लिये ही हो गया था.उसी दौरान उनका पहला कविता संग्रह,रामकृष्ण प्रकाशन से आया..उस क़िताब के लोकार्पण में प्रो.कमला प्रसाद,विनय दुबे.नरेन्द्र जैन शैलेन्द्र शैली ,हरिवंश सिलाकारी, आदि मौजूद थे,तब से पिताजी से हमेशा कमला जी संपर्क में रहते थे और मुझसे कहते थे की तुम्हारे पिता बहुत अछे इनसान हैं|एक साल बाद मेरे संग्रह के लोकार्पण में जब राजेश जोशी,पूर्णचंद्र रथ,रामप्रकाश त्रिपाठी आए,वे सब भी पिताजी से मिलकर उनकी विनम्रता का चर्चा करते रहे.मेरे मित्रों से भी पिताजी बहुत आत्मीयता से मिलते थे. श्री हरि भटनागर ,विनय उपाध्याय,पवन करण,आलोक श्रीवास्तव,रविन्द्र प्रजापति,,से वह सदा संपर्क में भी रहा करते थे.उनके शिष्टाचार वाला पक्ष तो ज़ाहिर है ख़ास था,लेकिन मैंने उनकी डांट,उलाहने,और फटकारें भी सहीं,बल्कि उन्हें शिरोधार्य करके आगे बढता रहा.वह हमेशा मुझे कोई बड़ा काम करने योग्य बन जाने के लिये, झकझोरते रहे.मेरा संतुष्ट दिखाई दे जाना,उन्हें बहुत असंतुष्ट करता था.वह कहते थे’’बड़े भाग मानस तन जाना—कान सुने जो पूत बखाना. यानि वो पिता भाग्यशाली होते हैं,जो अपने पुत्र का यश सुन पाते हैं..तुम ऐसा कुछ करो की तुम्हारा यश मैं देख ,सुन सकूँ,|अफ़सोस कि मैं ये ना कर सका|
एक घटना याद आती है मैं जब M.sc में पढ़ रहा था. शौक -ए -कविता तो था ही.मैंने भेज दी कविता छपने,और वह देशबंधु के रविवारीय में आ भी गयी.मोहल्ले में सभी लोगों ने बधाई दी,लेकिन पिताजी खामोश रहे.मुझे और चिंता हो गयी..आखिर मैंने माँ से अपनी बात कह कर लगभग पिताजी की शिकायत ही कर डाली.. कि वे..ऐसे वक्त में भी…..|माँ ने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा था.’हाँ मुझे ये चिंता है की अभी उसका ध्यान गणित में होना चाहिए.कविता के शौक में वह आत्ममुग्धता में फंसने के अलावा क्या पायेगा..पहले अच्छा कैरियर बनाये..फिर करे ये शौक.
उन्होंने बिल्कुल सही कहा था.एक कवि पिता की चिंता मेरे हित में थी..और मैंने फिर तभी इस दुनिया में कदम रखा जब में आत्मनिर्भर हो गया..|पिताजी ने सचमुच ही हम सभी ६ भाई बहिनों के सुरक्षित भविष्य के लिये अपनी ओर से जी तोड़ योजनाबद्ध तरीके से मेहनत की,और कामयाब भी हुए.|बहनों को शिक्षित करने के बाद उनके लिये सुयोग्य वर तलाशने के दिनों की माथे पर सलवटें देखी हैं मैंने. और अच्छे सम्बन्ध पाने पर उनके चेहरे की ख़ुशी भी.किसी सृजन से कम नहीं ये तलाश.इस अनुभव पर उनकी कुछ कवितायेँ भी हैं जिनका ज़िक्र कमलाप्रसाद जी ने उनके दुसरे कविता संग्रह ‘दुनिया के बाज़ार में ‘ में किया भी है |
मेरी और अनुजों की नौकरी लग जाने के बाद भी वह कभी संतुष्ट ना हुए.कहते ही रहते ..यथास्थिवादी मत बनो..सकल पदार्थ हैं जग माहीं..करम हीन नर पावत नाही.
पिताजी अपना ६७ वा जन्मदिन ना देख सके.वे तब हितोपदेश का काव्यानुवाद का आधा कम कर चुके थे..और तीसरे कविता संग्रह की पाण्डुलिपि बना रहे थे..और हाँ इस साल वह परिवार के लिये कार खरीदने का भी मन बना चुके थे..कि ६ जनवरी २००८ को दिल का दौरा आ गया..जीवन का शत्रु उनसे गहन इर्ष्या करने पर आमादा था. दिन के १२ बजे वह एक तस्वीर में बदल गए..और हम सब दुःख से ठन्डे होते जाने के सिवा कुछ ना कर सके..|जिनके साये में जीवन कितना सुकून भरा था.,अब उनकी यादें ही हैं जो सुकून का एक विकल्प मात्र हैं.