डॉ राहुल रंजन

सबकी चिंता की जा रही है पर जिसने देश को कोरोना के प्रति जागरूक करके शहरों और गांव गांव को बचाया वह योद्धा कोराना संक्रमित हो गया है और उसकी जान पर बन आई है। पत्रकार जो दिन रात उन लाखों करोड़ों लोगों को सुरक्षित करने के लिए जीवन को संकट में डाले हुए था उसकी जान पर बन आई है लेकिन उसे बचाने के लिए अब न सरकारें सामने आ रही हैं और न ही वे मीडिया हाउस जिन्होंने पत्रकारों और दानदाताओं के सामने मदद की भीख मांगी़।

करोड़ों जमा किए गए और पीएम राहत कोश में भेज दिए गए। वह अब स्वयं को भिखारी घोषित कर रहे हैं। प्रिंट मीडिया के तमाम कर्णवीर मालिकों ने पत्रकारों को लाकडाउन से अनलाक होते ही अपने संस्थानों बाहर निकालना शुरू कर दिया है। आर्थिक संकट के बहाने तीस से चालीस फीसदी वेतन कम कर दिया गया है। इधर मजदूरों और गरीब तबके के लोगों की चिंता में सरकार को नींद नहीं आ रही। उनके लिए रोज राहत योजनाओं की घोषणा की जा रही है पर पत्रकारों के लिए कहीं से भी एक आवाज उठती नजर नही आ रही।

कुछ संगठनों ने पत्रकारों को कोरोना योद्धा का सार्टिफिकेट थमा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर रहे हैं। दुर्भाग्य से देश में असंगठित श्रमिकों की एक बड़ी संख्या पत्रकारों की है जो महानगरों से लेकर सुदूर गांवों में दिन रात काम करते हैं। इनकी मजदूरी घंटों में नहीं आंकी जाती बल्कि उनका बंधुआ मजदूर की तरह अखबार मालिक दोहन कर रहे हैं। आज वह जिन बड़े भवनों और मंहगी कारों घूमते हुए लग्जरी जीवन जीते हैं यह उन्हीं पत्रकारों की मेहनत है जो पत्रकारिता को ही ओढता बिछाता है।

अनलाक होते ही पत्रकारों जीवन अंधकारमय हो गया है। रोज सूचनाएं मिल रही हैं कि पत्रकारों को किस किस बहाने से नौकरियों से बाहर किया जा रहा है। प्रिंट मीडिया के पत्रकारों पर इस तरह के प्रहार हमेशा से होते रहे हैं लेकिन इस बार जो तूफान आया है उसमे जो बच गए वह सौभाग्यशाली होंगे। केंद्र और राज्य सरकारों के मुंह में दही जम गया है वह पत्रकारों की जीविका को बचाने के मौन है। ये वही पत्रकार हैं जिनके सामने सरकारें, मंत्री और अफसरशाही हाथ जोड़कर और घुटनों के बल बैठी रहती है। अपनी उपलब्धियों के लिए करोड़ों बहाने वाली सरकारें हमेशा से ही अखबार मालिकों के पीछे नतमस्तक रही है वही अब जब पत्रकारों के हक की बात आई तो मुँह छुपाने लगी है।

कोरोना ने अखबार मालिकों को पत्रकारों को नौकरियों से बेदखल करने का पुख्ता बहाना दे दिया है। चूँकि पत्रकार असंगठित हैं इसलिए मालिकान इन्हें दोकोड़ी का मजदूर और सरकार चापलूस और भांड कह कर किनारा कर लेती है। लानत है पत्रकार मजदूर की श्रेणी भी नही पा सके। लानत है ऐसी पत्रकारिता और पत्रकारों को जो अखबारों को लाकडाउन करने की हिम्मत नही जुटा सकते। सोचें आप हैं तो अखबार हैं और अखबार हैं राष्ट्र है तभी समाज है, धर्म है तभी सरकारें हैं। कभी गोदी तो कभी लोभी तो कभी बिकाऊ और भी न जाने किन किन अलंकारों से विभूषित पत्रकारिता न जाने किस दंभ में जी रही है। पर बेशर्मों  की तरह लगे हैं समाज को बचाने। अपना परिवार तो पालने के लाले पड़े हैं और बातें देश को राहत पहुचाने की कर रहे हैं। जो अपवाद हैं वे पत्रकारों की श्रेणी में नही आते इसलिए श्रमिक, मजदूर पत्रकार अपने भविष्य की चिंता अब शुरू कर दें। यहां इज्जत है तो क्या उसका लेप लगायेंगे। सब्जी और पान ठेला की गुमठी वाला पत्रकारों से बेहतर है।