|| एक ग़ज़ल ❤️ ||

इक बिल्डिंग में क्या क्या नीचे आता है,

मुफ़लिस  खून   पसीना   नीचे   आता  है,

ऊँचे  ऊँचे   माले  कितने  सुन्दर   हैं,

मजदूरों   का   मलबा   नीचे आता है,

यार  पतंग  तो  बाद  में  नीचे गिरती है,

अव्वल  अव्वल  धागा  नीचे आता  है,

बतला दूँ क्या अपनी महबूबा का घर,

गर्दन  के  बस  थोड़ा  नीचे आता  है,

खोया खोया पहुँचा सतरा माले तक,

भूल गया  घर   मेरा   नीचे आता है,

पुल ने जोड़ा ऊपर यार किनारों को,

लेकिन बीच में दरिया नीचे  आता  है,

हमको रब  से  मिलवाने की ख़ातिर ही,

एक  बली  का  बकरा  नीचे आता  है,

जितना जितना ऊपर उड़ता है आदम,

उतना  उतना  मौला नीचे  आता  है,

‘ रवि ‘ के ऊपर थोड़ी थोड़ी ‘ दिल्ली ‘ है,

‘ मथुरा ‘   पूरा   पूरा नीचे   आता है!

रवि गोस्वामी