ब्रज श्रीवास्तव समकालीन हिंदी कविता के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं. उनकी कविताएँ गाहे – बगाहे सभी सुधिजनों की दृष्टि से गुज़री ही होंगी
और उनने उन्हें रुक कर सोचने को विवश भी किया होगा. कहना न होगा कि ब्रज की कविताओं में रोकने और सोचने को विवश करने की क्षमता है .

इस समय मेरे हाथों में ब्रज श्रीवास्तव का तीसरा
कविता संग्रह ” ऐसे दिन का इंतज़ार ” है .इस संग्रह में उनकी बहात्तर कविताएँ हैं
.
मेरा मानना है कि हमारे परिवेश में जो सौंदर्य और कुरूपता दिखाई देती है वही हमारे जीवन को सौंदर्य और कुरूपता प्रदान करते हैं .हमारा स्वभाव ,चरित्र और दृष्टिकोण इसी परिवेश की देन होते हैं .ब्रज श्रीवास्तव की कविताएँ भी उनके अपने परिवेश की उपज हैं .

“साहित्य समाज का दर्पण है .” यह साहित्यिक नारा आज भी समीचीन माना जा सकता है , किंतु समकालीन कविता के परिप्रेक्ष्य में ये कुछ
अधूरा सा हो गया है और इसलिए कि साहित्य
अब समाज का प्रतिरूप भर नहीं रह गया है, वह अब अपने समय से मुठभेड़ भी करता है .
और यही समकालीन कविता की प्रवृत्ति भी है
और ताक़त भी .

ब्रज की कविताएँ अपने समय से मुठभेड़ करती हैं . और सामाजिक चिन्ताओं को सीधे – सीधे पाठक के समक्ष प्रस्तुत करती हैं .

ब्रज श्रीवास्तव की शीर्षक कविता ” ऐसे दिन का इंतज़ार ” वर्तमान समय की एक बड़ी चिंता
“धर्म ” के बारे में विचार ही नहीं करती वल्कि यह भी स्पष्ट करने का प्रयास करती है कि धर्म
वास्तविक रूप में कब फलीभूत होगा . मंदिर
जाना या मंदिर में विराजमान मूर्तियों को सिर
झुकाना ही क्या धार्मिक होना है ? ब्रज सवाल करते हैं –
कब समझा जायेगा / धर्म का आशय ठीक – ठीक / जो कहीं सर झुकाने नहीं जाते/
कब माना जायेगा उन्हें भी धर्मप्रेमी /

और जब ब्रज कहते हैं –
ऐसे दिन की प्रतीक्षा है अब/ जब जातियाँ/ पेड़ की तरह बढ़ने देंगी मानवता को/
जब बच्चे हँसें तो सब / पूजा छोड़ कर आएँ उन्हें देखने के लिए .
तब वे धर्म की वास्तविक दिशा – दशा को व्यक्त करते हैं. और सचमुच जब हमारे भीतर इतनी निश्छलता आ जाएगी तभी धर्म के वास्तविक स्वरूप से हम साक्षात् हो सकेंगे , और धार्मिक पाखंडों से मुक्त भी .

हमने अपनी स्वार्थों की पूर्ति के लिए न तो धर्म को बख़्शा और न ही प्रकृति को . प्रकृति को भी
हमने उस दशा में पहुँचा दिया कि धरती का अस्तित्व ही चिंता का विषय बन गया –
वृक्षों ने कभी कोई / ग़लती नहीं की / जंगल को नहीं है/ कोई शिकायत उनसे
बादलों और पक्षियों ने/ कुछ नहीं किया ऐसा कि/ बिगड़े आसमान की तस्वीर
नदी को भी कोई नुकसान नहीं हुआ/मछलियों, मगरमच्छों और शैवाल से
और ज़रा धरती की पड़ताल करें/ कि यह जैसी भी है / किसकी वजह से .
( है किसकी वजह से )
हमारी स्वार्थी वृत्तियों ने धर्म और प्रकृति को ही नुकसान नहीं पहुँचाया है घने और गहरे रिश्तों को भी नुकसान पहुँचाया है . और इसके चलते
परिवारिक संवेदनाएँ भी विलुप्त हो चली हैं या यूँ कहें हो गई हैं .
वे वृद्ध जिन्होंने अपने जीवन के बहुमूल्य पल अपने बच्चों की परवरिश में नष्ट कर दिये , बच्चों के पास सब कुछ होने के बाद भी प्रेम से वंचित वे वृद्धाश्रमों में अपना अंतिम समय बिताने अभिषिप्त हैं .(वृद्धाश्रम)

ब्रज श्रीवास्तव की कविताएँ हमारी स्वार्थी वृत्तियों पर ही चिंतित नहीं हैं . वे प्रेम के हाशिए पर आते जाने को ले कर भी गहरी चिंता में दिखाई देते हैं . इसके पीछे वे राजनीति, और बाज़ार को मानते हैं .जिनके कारण सब कुछ हमारी दिनचर्या में शामिल है पर प्रेम नहीं . वह अंतिम पंक्ति में खड़ा कर दिया गया है .देखिए –
अपने हिस्से के रोज़ाना को / मैंने देखा दूर खड़े हो कर / इसमें मैं जितना मौजूद था / उससे ज़्यादा मौजूद हुई व्यवस्था .
×××
प्रेम पंक्ति में खड़ा रहा संकोच के साथ / मेरी दिनचर्या में / शामिल होने के लिए .

यद्यपि ब्रज श्रीवास्तव को प्रेम पर अनंत विश्वास है . वे प्रेम में जीवन की तमाम खुशियाँ तलाशते
ही नहीं पाते भी हैं . देखें –
जब हम चलते थे / एक उत्सव हुआ करता था
वृक्ष झूमते थे / आसमान फूल की तरह खिलता था / सड़क का हर हिस्सा / अपने आप
बिछ – बिछ जाता था आगे आकर
×××
हमने साथ चलते हुए लाँघा लंबा रास्ता / हमारे जीवन का खोखलापन / बस केवल यही वक़्फा भरता था .
इसलिए ब्रज ज़ोर देते हैं कि –
ये प्यार जो छा रहा है मन और मस्तिष्क में/ इसे घोलना चाहिए अपने रक्त में .

क्योंकि बुरे वक़्तों में प्रेम से बड़ा कोई आसरा नहीं है .ब्रज के इस संग्रह में प्रेम पर शायद सर्वाधिक कविताएँ हैं .जो प्रेम को लेकर उनकी
सकारात्मक दृष्टि को व्यक्त करती हैं .

ब्रज का काव्य संसार व्यापक है . इस संग्रह में उनकी अनेक विषयों पर बेहतर कविताएँ हैं . और ये सारी कविताएँ समय की भयावहता को
व्यक्त करती हैं और उससे बाहर निकलने के लिए बेचैन दिखाई देती अपने समय से टकराती
हैं .
ब्रज श्रीवास्तव की बाज़ारवाद पर गहरी दृष्टि है .
वे बाज़ार को प्रेम और रिश्तों को ही नुकसान पहुँचाने वाला नहीं मानते वल्कि कलाओं को भी बाज़ार से आहत देखते हैं .
कलाओं को ले कर ब्रज का मानना है कि कोई भी कला जब तक आत्मीयता के स्तर तक नहीं
अपनाई जाती वह निष्प्राण ही रहती है .
ढोलक जब बजती है / तो ज़रूर पहले /
वादक के मन में बजती होगी

किसी के गीत के संग / इस तरह चलती है ढोलक / कि गीत का सहारा हो जाती है / जिसके पैरों में घँघरू जैसी बँध जाती है ढोलक की थाप

ऐसी थापों के लिए / माँ बख़ूबी जानी जाती है
×××

अब यहाँ जैसा हो रहा है / मैं क्या कहूँ / उत्सव में हम सलीम भाई को बुलाते हैं ढोलक बजाने के लिए / और कोई नहीं सुनता

यहाँ हम स्पष्ट देखते हैं कि बाज़ारीकरण ने कलाओं को हाशिए पर ला खड़ा किया है .

×××

ब्रज की एक कविता है ” वह प्रसंग ” (पृ. 18 )
इस कविता में ब्रज श्रीवास्तव आतंकवाद को एक दुःस्वप्न केरूप में देखते हैं . स्वप्न के बारे में निश्चित नहीं होता कि कौन सा स्वप्न आने वाला है . अच्छा या बुरा .क्योंकि ये आकस्मिक. होते हैं आतंकवादियों द्वारा किये जाने वाले बम विस्फोट या अन्य आतंकी गतिविधियाँ भी आकस्मिक होती हैं , और दुःस्वप्नों की भाँति फलीभूत होती हैं . ब्रज इन सब दुस्वप्नों से बाहर निकल जाना चाहते हैं –
वह प्रसंग
दुःस्वप्न जैसा था

जो दुनिया की आँखों को भी
मज़बूर देखना पड़ रहा है
गुज़रा हूँ मैं भी उसको देखते हुए जाग कर
एक अवसाद से

नींद के दौरान भी
शहरों के चौराहों पर फटे बम
कराहे अनगिनत लोग

साँसों ने देखा एक बुरा सपना
और जीवन बेसुरा हुआ

स्वप्न अब उतर आया है
खुली आँखों में

एक और स्वप्न देखा
दुःस्वप्न से बाहर आने का .

ब्रज श्रीवास्तव बार-बार लौट – लौट कर धर्म के
पास आते हैं .धर्म और उसका पाखंड उन्हें बार – बार उस पर चिंतित करता है . केदारनाथ त्रासदी पर लिखी उनकी बेहतरीन कविताएँ इसका उदाहरण हैं . देखें –
जो मर गये केदारनाथ में
आख़री लम्हों में भी
मानते रहे तुम्हें ही महान
जो बच गये
वे भी तुम्हारे रिणी हुये
वाह रे ईश्वर
भक्त बनाना तो कोई
तुम से सीखे .(वाह रे ईश्वर)

××××

जैसा कि हम
आए दिन सुनते हैं
फलाँ ने फलाँ को
धोखा दिया प्रेम में
और वो तवाह हो गया
तुमने भी भक्ति के खेल में
बहुत बड़ा धोखा दिया
और वे तवाह हो गये . (धोखा)

इस तरह हम पाते हैं कि ब्रज श्रीवास्तव की कविताएँ मनुष्य की पीड़ा की कविताएँ हैं .
वे उससे ही जन्म लेती हैं और उसे ही व्यक्त करने में अपना होना सिद्ध करती हें .

संग्रह को पढ़ने के बाद सुखद अनुभूति होती है कि कवि ने अपने समय के सच को अपनी सूक्ष्म
दृष्टि से देखा और परखा है . संग्रह मेंऔर अन्य विषयों पर लिखी गई कविताएँ भी इसी मानवीय पीड़ा को स्वर देती हैं .
संग्रह में “उसकी रचना” , ” पता नहीं “, “अवांछित” , ” यह जो तनाव है ” , “यहाँ कोई नहीं” ” मोहल्ले के लड़के ” , “किन्नर “, “प्रतिरोध
” शरतचंद्र ” मशीन ” और “ख़बरों का अर्घ्य ”
आदि उनकी पठनीय कविताएँ हैं .
संग्रह निश्चित ही पठनीय और संग्रहणीय है .
अनंत शुभकामनाओं के साथ .
* दफ़ैरून
साँवरिया सेठ कॉलोनी
एयरटेल टॉवर के पास
टीलाखेड़ी रोड, विदिशा
464001 ( म. प्र. )

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